णाण - सार | Nan - saar

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Book Image : णाण - सार  - Nan - saar
[adinserter block="2"]

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about तिलोक चन्द जैन - Tilok Chand Jain

Add Infomation AboutTilok Chand Jain

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
सत्न सरी. ६ {.६३. `अद्धकि सके, ठ ७ ২ বত ০, ক ২২১২২১২০৬২১ ১৩৬৩ तरि ২১-১৯-২১১২रचना कर पुस्तकाकार , किया क्‍योंकि ' ऐसा किये विना कान नष्ट हो जाता 3ओर भी अनेक आचारयोंने अनेक ग्रन्थ रचे सो भी उतनी विस्तृत रचना नहीं किन्तु संक्षेपमें साररूपसे द्वादशांगके अनुकूल रचे इसलिये परिपाटी अपक्षा सवन कथित ही है)प्रश्ष-अन्थ तो अन्य घमंवालोंके भी हैं वह भी सर्वेज्ञकथित बताते हैं फिर केसे निणेय किया जाय |उत्तर-अन्थोकी मिलान करके जो अन्य युक्ति अनुमान प्रत्यक्षसे बाधित नहीं हो से प्रमाण मानो । निणय बुद्धिसे विचारे तो सांच झूठ छिपे नहीं, इसप्रकार निणय करो झोर सर्वज्ञकथित ग्रहण करो।कंदप्पदप्पदकणो उभविहीणो विश्ुकवावारो } उग्गतव दित्तगत्तो जोई विण्णाय परमत्थो ॥ ४ ॥ कन्दपदपंदलनों | दम्भविद्वीनो विमुक्तव्यापार: उम्रतपादीक्षगात्र: योगी बिन्नेयः परमाथ: ॥ ४ || वौ पार । काम गवे दशनेवारे, गत व्यापार कपर इब टके) खम तपोसे चीरित काया, सो क्ता ज्ञानी मुनिराया ॥ ४॥ अर्थ-कामरहित ज्ञान पूजा कुर जाति पराक्रम वैभव तप शरीर इन भार प्रकारके मर्दोसे रहित उम्र तर्पोंसे दीक्षिमान शरीरघारी ऐसे गुरु ही ज्ञानके उपदेशके लिये समथ हैं ।मावाथै-कामी मानी कपटी रागद्वेषयुक्त गुरु सत्यार्थ उपदेश नहीं दे सक्ते इसलिये ग्राश्न नहीं |




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now