नूतन आलोक | Nutan Alok

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Nutan Alok by अमृत राय - Amrit Rai

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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सब एक दी घर के हैं इसलिए कुछ छिपाभो मत मुझसे । सोना के कु व्यं क्षे गये, थद्ट विज्कुत्त दीऊ डी किया उन्दने! तो छुम সু ह यात दविपाना क्यों चाहती दो है रेसी बात सत कहो । इमारा घर यों द्वी बरबाद हो गया कुछ शान्ति वो रद्दने दो 1 द्‌ हो गया ! तुम्हारा क्‍या झुकपान हुआ ज़रा सुनूँतो! सुम्हें तो पक क्रादमी बदुुत भारास के साथ पुक दिफोजव को जगद पहुँचा भावी, मरन तो मेरी हुईं। ओद ! मेरा तुझ का ! मेरा बेटा | यू. चुरी मौत मरा । इस घर में राकस् भरे हैं--झठोर और লিল, ~व अरि देवरानी टा अपमान करने के लिए कुछ ' अपशब्द खोज र्ट यी जिते वह उसे शुस्सा दिला सके | ज्ीज को लगा कि उसमे साथ बेजा सलूक किया जारहा दे भरं वह कम्बल मे मेहं छिपाकर रोने छगी । बच्चा' दर गया और चिद्दाने छूगा । ४ माँ, क्या मामखा दे ? कोयले का एक गद्दर लिये हुए सोना छौटी तो बड़े फेर में पढ़ यथी । अपनी बेटी की झावाज्ञ खुनकर तो उसकी तझछीप: और जैसे बढ़-सी गयीं । भत्र यट्टी उसकी স্টভী ़द़की थी। उसकी दूसरी छड़को सोना से भी ज्यादा खूबसूरत थी । भर कितने अच्छे, कितने प्यारे थे दोनों बच्चे ! कभी उन्होंने पुक काम - उसको - मर्ज के खिछाफ नहीं किया। अपने য়া জী বাহ মী অহ नहीं देख सदी | उस घोटी-सी कम पर वद दो यार जा चुकी थी |: घद सोच दी नहीं पाती थो कि उस वक्त হা कैसा दिखा रद्दा दोगा । उसकी हा्ठत क्या इलाज किये हुए बकरे के समान रही दोगी, जिसकी आँत--पीखी, सफेद और ” ाऊ--निकाज्षकर अत्षग कर दी आती ह । इस विचारमात्र से उसे टया कि कोह उसकी अँत़ियाँ निकाले दाङ रदा ै। मो रोभ्रो म । छाकी, माको क्यो ख्टारदीहो हुम, लेकिन सिसकने सोना भी छगी । , कं११




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