भेड़ और मनुष्य | Bhed Aur Manushya
श्रेणी : साहित्य / Literature

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
7 MB
कुल पष्ठ :
181
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)पति-पत्नी ७जाता हूँ | इन्हीं क॑ लिए कमाकर् लाता हूँ। घर का काम छुम्हारा
हे। बच्चों की देख-रेख तो औरतों का ही धमं है।यह হী
काय्य पुरुषों से कैसे हो सकता है ¢ |
बातें वहीं पर समाप्त हो जातीं। जया और जगन्नाथ दोनों
शिक्षित थे । दोनों ही एर ए पासे | एफ० ए० फ् बाद
जगन्नाथ ते सौ ही पाञ्च किया था और जया भी
शादी से पूं छः मत्ते तक सहिला विद्यालय में बी ए० पढ़ने
गई थी | |
उर का काम निश्चय ही औरत का हे, यह बात जया
स्वय स्वीकार करती थी | वह सोचती, सचभुच आदिकाल से
यही मानब-सभाज में होता आया है| डुह्ता, बधू, भायों,
गहिरी, माता आदि भाचीनतम नाम स्त्री-जाति के उनके घरेलू-चএন ৭ সাং ही पड़ गए हैं। तब इस तक का उत्तर ही क्याबह सोचती कि सुबह जल्दी-जल्दी खाकर वे स्कूल को दो मील
साइकिल पर जाते हैं, और दिन भर के परिश्रम फे उपरान्त
फिर दो मील की यात्रा करके, शाम को थके-माँदे लौदते हैं: ।
इस पर भी उस बार बिना जया को बतज्ञाए, उन्होंने एक
< धरान किया था, ओर चार महीने में सो रुपया लाकर उसको
दिये थे। फिर वे दो जोड़े बढ़िया साड़ियों और ब्लाउज के उत्त
रुपयों से लिये गए ये । घर पर भौ वे क्या खाली बैठते ই?
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