निरतिशय नानेश | Niratishaya Nanesh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रकाशकीय “श्री अखिल भारतवर्षीय साधुमार्गी जैन सघ' के अष्टम आचार्य 1008 पूज्य श्री नानालालजी मसा की पावन स्मृति में प्रकाशित यह “निरतिशय नानेश' ग्रथ अपने आप में उपलब्धि है। उपलब्धि भी यह तीन रूपो में है। प्रथम, इसके प्रकाशन का एक गौरवशाली इतिहास है, द्वितीय, इसके माध्यम से आचार्य श्री नानेश के जीवन और प्रदेय के विविध पक्षो को उनकी सम्पूर्णता में उद्घाटित करने का प्रयास किया गया है, ओर अतिम, यह एक सकल्प की पूर्ति है। पहली उपलब्धि की बात वर्ष 1993 से जुडती है जब आचार्य श्री লালহা का चातुर्मसि देशनोक मे आयोजित था। धर्म, ध्यान, तपस्यार्ओं ओर प्रवचनं की अनोखी प्रवृत्तियों के चलते पुण्यघरा देशनोक साक्षात्‌ तीर्थ बन गई थी जिसके केन्द्र म आराघ्य के रूपमे आचार्य श्री नानेश एव युवाचार्यश्री रामलालजी म सा विराजित थे । आचार्य प्रवर के उस 54 वे चातुर्मास को एकं स्मरणीय चातुर्मास बनाने की भावना से सम्पूर्ण श्रावक समाजं अनुप्रेरित था। धर्म-प्रभावना एवं सामाजिकं चेतना के विविघ कार्यक्रमो पर चचिं आरम हो गई थीं । तमी कतिपय उत्साही श्रावको के मन मे देशनोक को धर्म-ध्यान एव समाज-सेवा के एक विशिष्ट केन्द्र के रूप मे विकसित करने की प्रेरणा जाग्रत हुई और उस हेतु वहाँ एक सस्थान की स्थापना की योजना बनी जिसे गतिशील करने के केन्द्र बने सूरत के एक उद्योगशील श्रावकं श्री इन्दरचद बैद जिन्होनि एक आदर्श सस्थान की रूप-रेखा प्रस्तुत की। आचार्य नानेश के चितन तथा आदर्शो को पूरितं करने का लक्ष्य होने के कारण सस्थान का नाम समता शिक्षा सेवा सस्थान प्रस्तावित किया गया । इसमे धार्मिक एव आध्यात्मिक विषयो के अध्ययन आदि की विशिष्ट सुविधाएं उपलब्ध कराना तौ लक्ष्य था ही, इस हेतु एक समृद्ध पुस्तकालय की स्थापना तथा ज्ञान के विनिमय के लिये एक मासिक पत्रिका के प्रकाशन की योजना भी प्रस्तावित थी । श्री इन्दरचद वैद को ही




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