हंसनाद | Hansanad

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Hansanad  by चन्द्रदत्त शास्त्री - Chandradatt Shastri

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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इसनाद ও অন भ्रातांगण विचार कर देखेकि फारसी के भायः सव पद्‌ स रकतही स बने देखपड्तहें इसौकारण मुझको फारसी से संस्कृत चना -कर देखरादने में कुछ भी परिश्रम नहीं हुआ और इनके অঙ্গ में भी -मिन्नता। नहा हुई, तालच्यांर्थ दोनों का एकह्ी रहा-- यदि जौ चद तो आप यथै मी पुनर्हनिय-- उधर फारसीवाले द्वोनों पदों का अयथे है कि ५ है भाई ! जहाव जर्थावु चचार्‌ किसी के साथ नहीं रहता इसकारण अपने दिल को उस सेसार उत्तन्नकरनेवाले ईश्बर के साथ बांधों और बस ” ( फारसीवाले इसको सपकेग ) भत्र उसी का जा संस्कृत कियागयाह उपक! गथ मी घुनिये --- ससहृत में--- [ ज्ाह्मम* ] जहां वार २ जावे अर्थात भहां पाणी वृत्‌ स[करर्‌ जन्गत्तं मर्त হা লালা सा { ए वारादर ) हु चारा से आदर कियजञानवाले अथांत्‌ हे उत्तमवीर ( ने मानद३ ) नहीं मान- देने ( चाकस्य ) किसी भी पुरुष का, तालस्वे यह कि ज- हानकी सम्पत्ति क्रिसी को मानदनेवाली नहींदोती इृसक्िंय कहा ই कि हे भाई जहान उसी के साथ नहीं रहता इमकारण (টনি धर ) घिन वारण कगे क्‍योंक्रि ( जाहान ) यह अदान { सपण) उस त्रश्म के साथ ( बद्ध: ) वंधाहुआड़े ओ ( बशः ) उसी के ब- शीभृत है । देखिये पद के पद और उनके तालयर्थि भी श्षगीप २ समनी र्ट्‌ ॥ फिर तीसरे पद का फारसी में अर्थ हैं ( छु्स सुपदि ) पूर्य की मालाकार मूर्ति ६ दरसियाही शुद्ध ) श्यागता में चन्नीगई धातु # जतत नादात यन्ति यद्गन्ताव गदयथकात्‌ शा धातोः [ करणाधरिकरण याश्च ] इति सुत्रण अशिकरणे ल्युट्‌ प्रत्यय , छनें [ युवोरनाको | इति बृद्रेण युस्थाने अनादद कत ( जाहान ) হাবিব निष्मचस |




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