हिन्दुस्तानी त्रैमासिक | Hindustani Traimasik

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Hindustani Traimasik  by श्री बालकृष्ण राव - Balkrishna Rao

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१६ हिन्दुस्तानी भाग २६ राजनैतिक हथकणष्डों से बनाना गत बीस वर्षों के अनंमव से हम यह जान लेना चाहिये कि एज़ुमठच और नाटक को विशद्ध कडायथान होना चाहिये । रद्धंमल्च अन्‍य कला লালা की भाँति सीमित परिवेश में सीमित लक्ष्यों का माध्यम नहीं है। वहु मानव जीवन के व्यापक परिवेश से मानव-जीवम की गहरी और जटिल स्थितियों का प्रतिनिधित्व करता है और इसलिये उसे मानव-जीवन के व्यापक भाव-स्तरों का अन्वेषण और प्रतिप्ठापन करता चाहिये। जो लोग हिन्दो' रश्मव्च के आन्दोलन में हों, उन्हें यहू मालूम होना चाहिये कि रज्जरमज्च की सार्थकता तभी है जब बह अपने माध्यम की प्रकृति और उसके दायित्व को मानकर घड़े और मनुप्य की गहततम मत्वियों को परिप्कृत करके प्रस्तुत करे। हिन्दी रजुमब्च को इस बात से भी नही डरता चाहिये कि वह परम्पराहीन €। कला के क्षेत्र म॒ कभी-कभी परस्पराद्वीन होना भी' लाभदायक होता है। यदि हिन्दी रजुमज्च की कोई अपनी परम्पणा नहीं है तो इससे लाभ उठाया जा सकता हैं और योजनाबद्ध तरीके से स्वतन्त्र प्रधोग किये जा सकते है। लेकिन वे छोग जो परम्परा से चिपकने के लिये आज के यूग में संस्कृत नादट्यशास्व या पारसी यियेटर कम्पनियों था रामछीला मण्डलियों से अण्ना नाता जोड़ कर उतका फूहड़ अनुकरण करना चाहते है, वहन तो परम्परा का सिर्बाह करते हे ओर ने अपनी सम्भावनाओं के ज्रति ही उदार हो पाते है। यहीं एक सबसे बड़ी प्मस्या यह उठ खड़ी होती है कि फिर हिन्दी रज्भमज्च कों प्रा प्ठित कैसे किया जाय ? उसको प्रमाणिकता कंगे मिले ? यहु प्रश्न जितना सरल है, उत्तना ही जमक भी । मैं समझता हूँ कि प्रामाणिकता के लिये यह सब करते के बदले यदि बह अभिनय, मंठच-संयोजन और प्रस्तुतीकरण में अद्वितीय भाव-स्थितियों का प्रदर्शन करे और सानव- जीवन मे निहित सवेदनाओं का प्रदर्शन सटीक और भावानुकुछता को ध्यात में रख कर बरें तो बह स्वथं अपने में इतना मूल्यबान हीगा कि किसी भी परम्परा से न जुड़ सकने के बावजूद भी वह अपने को प्रतिष्ठित कर सकता है। आज के सन्दर्भ में हिन्दी र्धमञ्च के सामने एक दूसरे प्रकार का भी भय है। कुछ रेण प्रायः यह्‌ कदु केर कि हिन्दी में अभिवय योग्य नाटक ही नही है, वे अंग्रेजी या अन्य नाटकों का रूपान्तरण प्रस्तुत करने रूगते हैं। मेरा अपना मत है कि इस प्रकार का पैवस्द ७ूग।ते से भी हिन्दी ताक और हिन्दी रख्धभज्च पुनर्जीवित नही हो पायेगा। उसके लिये' आवश्यक है कि वह हिन्दी के नाटक के माध्यम से ही आगे बढ़े ! एक और समस्या भी आजकल हिन्दी रज़मठच के विभिन्न समर्थकों छरा प्रस्तुत की সানী है। अति भावुक निदेशक या लेखक आज हिन्दी रज्धमझूच को अभिनय और भावाति- व्यड्जना का माध्यम न मानकर उसे तिलस्मबाजी का माध्यम बनाना चाहते हैं। वे नितास्त अनभिज्ञता के आधार पर नाटक के साथ छाया वाटिका या फ्लैश वैक' के माध्यम से चमत्वर पैदा करके रज़मज्च को उसकी सीमाओं सें न रख कर उसे बहुधस्धी बना देने की चेप्टा करते है। कभी-कभी यह सस्ती रूमानी और ओछी मनोव्तियाँ रज़्मम्च को केवल एक सतड़ी स्तर पर प्रयोग करके छोड़ देती हैं। रज्जमडच पात्र चमत्कार या चकाचौंथ या रज्भीन सेट और कीमती सजावट कौ कस्तु नही है रङ्गमञ्च अभमिनय-कला मौर प्रस्तुति की विष बो को मर्यादा का




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