वर्णी- वाणी भाग दूसरा खण्ड चोथा | Varni-vani Part-ii Khand-iv

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Varni-vani Part-ii Khand-iv by दरबारीलाल कोठिया - Darbarilal Kothiya

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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२७ गणेश वर्णी : जीवन झाँकी लूकड़्हारेके पैरका काँटा- निकालकर, विषमताका परिहार करते इए- दलित पिपासुको अपने पात्रे पानी' पिलाकर या शीतते ठिदुरती भिखारिन 'को अपना चादर ओढाकर अपनी सदय वृत्तिका परिचय देते थे । उनका विवेक जागृत ओर वाणी निर्भीक थी । राष्ट्रीय महत्त्वके प्रश्नों तक भी उनकी दृष्टि पहुँचती थी । जबलूपुरकी जतताने उन्हें आजाद हिन्द सेनाके बन्दियोंकी मुक्ति हेतु आशीर्वादके साथ शरीरपरकी एकमात्र चादर दान करते हुए देखा है, जिसके फलस्वरूप जनताने उक्त कार्यमें अच्छा आधिक सहयोग देकर यह चादर पुत्ः उनके चरणोंमें अपित की । ` छलितपुरमें आचार विनोवा भावेने उनकी समता एवं निष्पूहताकी सराहना 'करते हुए उन्हें प्रणाम किया । | समाज और .राष्ट्रके जीवनमें उन्होंने सदैव सदाचार और अपरिग्रहको अनिवार्य निरूपित किया. भारतके प्रथम गणतंत्र दिवस पर उन्होने क्हाथाः-- | । .._ “भारतको स्वतन्बता भिी, परन्तु इसकी रक्षा निर्मल चरित्रसे होगी । यदि हमारे अधिकारी महानुभाव अपरिग्रहवादको अपनायें तथा 'अपने आपको स्वार्थकी गंधसे हुर रखें, तो सररू रीतिसे स्व-परका भला कर सकते हैं ।” .. मानवताक़े प्रति वर्णीजीकी जो ईंढ़ आस्था थी उसी आधार पंर “हरिजन मंदिर-प्रवेश” जैसे क्रान्तिकारी प्रदनों पर भौ उनका अभिमत स्पष्ट, निर्भीकि और दृढ़ रहा है। तत्सम्बन्धी विरोधोंका सामना करते हुए उन्होने कहा था-- । | “हरिजन भी सी, पंचेन्द्रिय, पर्यास मनुष्य है । उनमें सम्यग्दर्शन आघप्त करनेकी सामर्थ्य और ब्रत धारण करनेकी भी योग्यता है । समन्त- 'भद्गाचार्यने तो सम्यर्दर्शन-सम्पन्न चाण्डालको भी दिवकी संज्ञा दी है; पर आजके मनुष्य धर्मकी भावना जागृत होने पर भी उसे जिन-दर्शन-मंदिर अवेशका .अनधिकारी मानते हैं ।”




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