नेपाल का इतिहास | Nepal ka Itihas

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Nepal ka Itihas  by खेमराज श्री कृष्णदास - Khemraj Shri Krishnadas

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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नैपारका इतिदास्तर 1 (११) अतिभा विराजमासदे | इन्द्रस्थात पर्वतके ऊपर केशपुर और चब्वक नामक दो शहरदें । इसका पूर्वाश ,धानकोटकें नीचे, और एक रपत्यका चन्द्रगिरिकी तले- टीमें है । यह देवचाया पवेत्त नागार्जुन, मद्दामारत ,और फूल्चोपा पवेतकें सग सिला हुआहि । यदद पवेत नैपाल उपत्यकाकी ठीक सीमाके अम्तमें है । इनके अतिरिक्त उत्तर पूर्व कोणमें भीरवन्दी और कुमारपवेत्त नामके दो शिखरहें, भीरबन्दी पषवेत नेपाल उपत्यकाके सब पर्वतोंसे उंचाहे ! सबसे ऊचे शिखरको कौलिया कहतेहें | जो उपत्यका मूमिसेभी चार हजार फुट उचाहि | उसके संग पूर्वेकी ओर काकन्नि पर्वतका भेलंहै । दोनोंके बीचमें जो पहाड़ी मार्गहे वह छः: इजार फुट ऊंचेपरहे । इन दोनों पर्वतोंके खच्तरमें नवकोट चपत्यका और पश्चिममें कालपू नदीकी उपत्यकाहै । कुमार, भीरवन्दी, काकन्रि, शिवपुरी, मणिचुड़ और महादेवपोखरा यदद छः पबेत बिशूछू गंगासि इन्द्राणीके किनारे तक लम्बे और जिवजिविया ( गोसाई थानके दक्षि- जकी ) पर्वेतमालाकें साथ समान अन्तरसे खड़ेहैं । चन्द्रगिरि, फूलचोया, मणिचुड, शिवपुरो, नागाजन पवेतका उत्तरांश यह सबही गहरे वनसे ढुके हमर, और चीते, बाघ, भालू तथा बनैले शुकरोंकें रहनेको मानों घरहीें । भ् थ नेपाछ उपत्यकाकी पह़िली दा 1 दिन्दुओंके सिंद्धान्तसे यह उपत्यका बहुतकाल पहले एक ड़िम्बाकार बडे गहरे सरो- चरके रूपमें थी । यह सम्पूर्ण पर्वत उस सरोवरके किनारसेदी उठेथे । चाद्धलोग कइतेहे कि, मेजश्री बोधिसत्वने हो उस बड़े सरोवरका जल निकालकर उसकी सुन्दर रहने योग्य उपत्यकाको बनायाथा उसने अपने खड़से कोटवार नामक एक पहाइका शिखर काटा, और उसमार्गसे सब जल बाहर निकालदिया | फूल्चोया और चम्पादेवी पर्वतके वीच जो खाई छोडकर वाघमती वहतीड़ें, सुनतेंें कि, वह खाई मंजुश्नीने ऐसीही बनाई थी । मंजुश्नीका उपाउ्यान छोडदेने पर भी यह उपत्यका एक समय जलमययी, सौर प्राकृतिक परिवर्तनसे बह्ुतकाल पीछे उपत्यका बनगई” यह बात देखनेवाले सदजमेंही समझ सकतेदें । यह उपत्यका डिम्बाकारहै | डपत्पकाकी नदी । चाघमति-शिवपुरी पवतके ऊपर उत्तरकी ओर वाधघद्वार नामक स्थान एक झरनेसे निकलकर शिवपुरी और मणिचूण्डके बीचमें होती हुई घूम फिरकर शिवपुरी पर्वेकके ऊपर गोकर्ण नामक तीथस्थानके पास शियालनदी वा शिवानदीके संग मिलगइहै । बददति दक्षिणकी भोर प्राचीन बौद्धक्षेत्र केशचेत्यके निकट पहुंचीहैं । फिर मंगेश्वरी खाइके नीचसे होती हुईं पशुपतिनाथ क्षेत्रको प्राय: तीनों ओरसे पेरकर दक्षिणा- मिमुख राजधानी काठ्माण्डूके पास भा निकली है । काब्माण्दू इसके दड़िने किनारे और पाटन नगर वाएं किनारेपर है । पीछे दक्षिणकी मोर एक खाईमें बद्ढत्ती हुई चब्वर




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