संप्रदाय प्रदीपालोक | Sampradaya Pradeepalok

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Sampradaya Pradeepalok by कंठमणि शास्त्री - Kanthmani Shastri

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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५ „ प्रकर च्छु प्रष्यकाय नहीं होता, इस बात को सम्रसाण দিক या गया है । इन सब उपक्रमों के द्वारा अन्यफार ने ओवर्कभाचाय- चरणों के समय की सुन्दरता और उनके कलिकाल में इस समय के प्रादर्भाव का जो अनुपम सयुक्षिक प्रतिपादन किया ई--कहना पढेगा-- यह अन्थकार की अलौकिक सूर हे । इस अकार अक्निमार्ग पथिकों के अज्ञानानधकार-निवर्तक नामक प्रथमप्रङर सें, वास्तव जे, अन्वर्थक विषयों का संकलन हुआ हें ४ द्वितीयम्करण से--श्रीनिष्णुस्वामी के चरित का चशंन &, जिसमें उनकी मानसिक भ्दत्ति का शुकाव भगवान्‌ कौ अर होता कौर बे सर्ववेदयेदान्त-तास्पयं स्वस्य किसी परमतत की गवेषणा करते है । फलस्वरूप श्रपने अथक परिम से उन्हें सगवध्सा हात्कार होता है। आगे चलकर भसगवत्सेवा-प्रणाल्िका--सेव्य-सेवक क-मगवान के परस्पर-संलाप ( प्रश्नोत्तर-प्रणाली ) से भक्ति-मागं की प्रणाह्षी-- निर्धारित होती है । इसी प्रकरण में देवी और आपसुर्र सृष्टि की विभिनज्ञता और भक्तिभाव की प्रधानता का प्रतिपादन किया यया है ! इस कार अंथकार ने विष्णुस्वामी और भगवान, इन दोनो उक्ति-प्रत्युक्ति से बहुत कुछ सांग्रदायिक त्वो ऋं स्पष्टीकरण किया है। ১০৭ तृतीयप्रकरण में--विष्णुस्वामी-संप्रदाय के आचाय विल्वमक्षल के चरित से उपक्रम किया गया है | बिल्वमंगल के विषय में जो किम्वदन्तियाँ प्रचलित हें और उन्हें एक ही समझकर जो वियार-विश्वत् फैल गया है, उसका इससे निराकरण ड्ोता है, जिससे यह स्पष्ट विदित हो जाता है कि बिल्वमंगल तीन हुए हैं । अतः संप्रदाय के आचार्य बिल्वसंगल कौन और केसे थे, इसमें संदेह नहीं रह अता ¦ इसके अनन्वर मायावाद की उत्पत्ति के विषय में पुरायाजुलार ३. “क




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