कागज की किस्तियाँ | Kagaj Ki Kihsitya

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Kagaj Ki Kihsitya by लक्ष्मीचंद्र जैन - Lakshmichandra Jain

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about लक्ष्मीचन्द्र जैन - Laxmichandra jain

Add Infomation AboutLaxmichandra jain

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
सदा-नीरा करुणा अठ मासकी ज्वाला-सी ऋतु थी । मध्याह्लकी धरापर पाँव रखना दभर थाः। कपिवस्तु ओर कोछिय नगरोकी सीमाओंको विभाजित करने- वाटी नदी रोहिणीकी धार क्षीण होकर एक पतली तरर श्वेत रेखा बन गयी थी । दोनों नगरोंके श्रमिकों और किसानोंमें विवाद उठ खड़ा हुआ था | कपिलवस्तुके श्रमिक बाँध बनाकर रोहिणीका जल अपने लिए सुरक्षित कर लेना चाहते थे और कोलिय नगरके श्रमिक उसी उपाय द्वारा अपने _ लिए । दोनों नगरोंमें ठन गयी । विवाद क्षत्रियों, सामन्‍्तों और सेनापतियों तक पहुँच चुका था । एक दिन प्रातःकाल दोनों ओरके सामन्त शारीरिक ०१ ভোলা 28३... ॥ পপ পপ পলা सामर्थ्यके आधारपर विवादका निर्णय करनेके लिए आ डटे। आवेशमें | वध्वयागंत! की आ्राख्यायिकाएँ प 5




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now