पद्मचरित | Padmcharit

[adinserter block="2"]
Add Infomation AboutDevendra Kumar Jain
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
10 MB
कुल पष्ठ :
394
श्रेणी :
हमें इस पुस्तक की श्रेणी ज्ञात नहीं है |आप कमेन्ट में श्रेणी सुझा सकते हैं |
यदि इस पुस्तक की जानकारी में कोई त्रुटि है या फिर आपको इस पुस्तक से सम्बंधित कोई भी सुझाव अथवा शिकायत है तो उसे यहाँ दर्ज कर सकते हैं
लेखक के बारे में अधिक जानकारी :
No Information available about देवेन्द्रकुमार जैन - Devendra Kumar Jain
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)पद्मचारितअयोध्याकाण्ड
इकीसवीं सन्धि[१ ] एक दिन विभोपणने सागरवबुद्धि भ्टारकसे पूछा कि
“जयलक्ष्मीके प्रिय, रावणकी विजय, जीवन और गज्य, कितने
समय तक अविचल रहेगा ।” तब उन्होंने कहा-'सझुनो, मैं बताता हूं,
अयोध्याके रघुवंशमें दशरथ नामका मुख्य राजा होगा, उसके दो
पुत्र घुरंधर धनुधोरी, बासुदेव और वलदेव होंगे, राजा जनककी
कन्याको लेकर, होनेवाले महायुद्धमें रावण उनके द्वारा मारा
जायगा” | यह सुनकर विभीपषण एकदम उत्तेजित हो उठा मानो
घीका घड़ा आगमें पड़ गया हो । उसन कहा--लंकाकी बेल न
सूखे और रावणका मसरण न हो, इसलिए क्यों न में, भयभीषण
दशरथ ओर जनकके सिरोंकों तुड़वा दूँ?। यह जानकर
कलहकारी नारद वधमान नगर पहुँचा। उसने दशरथ और
जनकसे कहा कि आज विभीषण आयगा और तुम दोनोंके सिर
तोड़ देगा । तब, वे दोनों अपनी लेपमयी मूर्ति स्थापित करवा कर
बहाँसे चल दिये। विद्याधर आये और उन्हीं लेपमयी मूर्तियोंके
सिर काटकर ले गये ॥ १-१०॥
User Reviews
No Reviews | Add Yours...