योगदर्शन तथा योगविंशिका | Yogdarsan Tatha Yogwinshika

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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हि (३३ धकं युर्तककोा सम मुच मेरे परम श्रद्धान्पद उन सहायकोंकी सह यताका ही परिणाम समझ, भे॑ तो इसमे स्वल्प निमित्त मात रहा हैं) वे सहायक हैं मवर्तेक श्री कान्तिविजबजोके शिष्य सुभि श्री चलुरविजयजी ओर उनके शिव्य रूघुवयस्क सुनि थ्री पुण्यविज्यजी | हच्तलिखित घतीयोंकी संपादित दित कर उन परते प्रेस कापी करना. पफ देखना तथा छिंदीसारका संशो- धन करके उसके ग्रफोंको देखना आदि सब चोद्धिक तथा शारी- रिक काम उक्त खयुवयस्कः सुनिने दी प्रधानतया किये है। उनके गुरु আী चतरविजयजी माराजने उक्त कामम सहायता देनेके अलावा प्रेस. छपाई तया अर्यैसे सवध रखनेवाटी अनेक उल- झनोंकी सुलझाया है। निःसन्देह उक्त दोनों गुरु शिष्यकी सहृदयता, उत्साह शीरलूता और कुशछूता सिर्फ मेरे ही नहीं बल्कि सभी साहित्यप्रेमीके धनन्‍्यवादके पात्र हैं। संक्षेपर्म निष्पक्षमावसे इतना ही कहूँगा कि हीयमान साधुभावका चिरलरूपले आज जिन इनि गिनि व्यक्तियोंम दर्शन होता है उनमे प्रवत्तकजीकी गणना निःसंकोच भावसे की ज्ञानी चाहिए। प्रवत्ते कज्नीके ही गुण उक्त दोनों गुरु शिश्योंमे, खासकर उक्त छघुवयस्कः झुनिर्म उतर आये हें यह बात उनके परिच- यम आनेवादा कोई भी स्वीकार किये बिना न रहेगा। योगसूजवबृत्तिकी एक ही लिखित प्रति न्यायांभोनिधि आत्मारामजी महाराजके भाण्डारसे सिल सकी थी जिसके डयरले प्रेस पी तैयार की गईं। उस परतिर्म यक्ष तत्र कई जगह अक्षर, पद या वाक्य दक खंडित हो गये थे। दूसरी घतिके अभावसे उस खंडित भागकी पति वहुधा अथानुर्लंधानजनितं कल्पनासे किका उपाष्यायजीक्र दी रचित शासत्रचार्तासमुच्चच- হীক্ষা আলি अन्य अरन्योमि पाये जानेदाङे समान विषयक




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