शकुन्तला | Shakuntla

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Shakuntla by उमादत्त शर्मा - Uma Dutt Sharma

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१३ प्रथम-परिच्छेद । यी ध उडाना आरम्भ कर दिया ! मेनका पवनके उत्पातसे अपनेकी वचने के स्यि बड़ी सरख्तास्ते अपने वस्त्राच्च समेटने छगी । परस्तु उसक्रो रसणी-युल्म इरा सरख्ता লিসিন चच्वटताने महामुनिके चित्तफो चश्च कर दिया । वे उससे एक बार प्रेम-सम्भापण करने के लिये अधीरसे हो उठे । महामुनिने मेनकाफी बुलाया परन्तु वह भयसे कांप उठी । परन्तु उसने ज्योंही आनम्द मिश्चित प्रेम-भाहान की ओर दृष्टि उठा कर देखा, तो उसका समस्त भय और सङ्कोच दूर हो गया। उराने समक्ष छिया कि तीर काम कर गया । महा- मुनिकी अखण्ड समाधि भक्ञ हो गई ! तपस्या नष्ट हो गई। লা मेनकाने सुभवसर देख अपने सभी अस्त्रोंका सथ्चालन आरम्भ किया ! महामुनि उसके हावभाव ओर कटाक्ष-निश्षेपले घायछ हो उस पर गोहित हो गये। जप-तप सब नष्ठ हो गया ! समाधि समाप्त हो गई और महामुनि विश्वामित्रमे अन्तमें मेसकाको पत्नी- हूपमें ग्रहण करके जङ्गट्मे ही सङ्करं करना आरम्भ कर दिया ।- निजेन वन) उनका लीला निकेतनं घन गया । नव-दृम्पति, नई उभङ् ओर नित्य नूतन जछ्ाससे पना समय व्यतीत करने छो । द्रसी प्रकार्से बहुत सा समय व्यतीत हो गया। इन्द्रके हृंदयको अपने धोर तपसे कापानेवाले विश्वामित्र, अप्सरा भेनकाके इशारे पर नाचने खये | दसी प्रकारसे श्छ समय व्यतीत हो जाने पर मेनका गर्भवती ই! नो मास समाप्त होनेपर मेनकाने एक परम रूपवली सुन्दरी कन्याको प्रसव किया । सुप्ति विश्वामिन्न अपने तपस्या भङ्क-रूषी वृक्षफे इस फलको देखकर बड़े दुःखी हुए। वे मन ही मनमें पश्था- ताप करने छगे कि मेंने धर्माधमेका क्चिर न कर तपस्या भर समाधिको तिलाखछि दे तथा विवेक-ज्ञान-शून्य हो एक अज्ञात छुछ-




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