भारत की एक झलक | Bharat Ki Ek Jhalak

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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७ विषय-प्रवेश रूपमे संसारे सामने उसने इस चित्रको रखा, उससे मालूम पड़ता था कि सहृदयताके आवेशमें आकर उसने भारतको मुक्त कर दिया दै । एक ओर तो ब्रिटेन संसारके सामने महानतापूर्ण चित्र रखनेकी चेष्टा कर रहा था और दूसरी ओर विषपूर्ण कूटनीतिके जहरीले तीर भारतकी छातीमें घुसा रहा था। फलस्वरूप बीसवीं सदीके मध्यमें भारतका विभाजन हुआ, जब कि संसारमें दिनोंदिन विश्व-सरकारकी भावना प्रबल होती जा रही है । राष्ट्रीय भारतने इस विभाजनका पूर्ण विरोध किया। द्र सितम्बर १६४० ई० को महात्मा गांधीने कहा था- “1०8९ [09 79109 900. 19906 17018 ( भारतको टुकड़े-टुकढ़े करनेके पहले मेरे टुकड़े-टुकड़े कर दो | ) लेकिन हठवादिता और भेद्नीतिके सामने राष्ट्रपिताकी दाल न गली । अंग्रेज चछते समय भी अपनी भेदनीतिको काममें छाने पर तुले हुए थे । इसमें उनका प्रवल स्वाथं था। परिस्थितिकी जटिरूता तथा मजवूरियोक कारण वे भारत छोड़ रहे थे। लेकिन अपने बहुमूल्य रत्नको खोनेकी भावनासे उनका बोखलाना स्वाभाविक था | भारतके प्रचुर साधनोंका उन्हें ज्ञान था। वे जानते थे कि यदि भारतको शान्तिपूर्वक भ्रगतिका अवसर मिरु गया, तो उसे तुरत एक प्रर देयकी शक्ति प्राप्न हो जायगी । प्रगतिशील भारतसे उन्हें व्यावसायिक प्रतियोगिताका मी खतरा था। इस कोरण भारतके विभाजनके द्वारा अंग्रेजोंने हमारे बीच जटिल समस्याओंकी सृष्टि कर हमारी प्रगतिका कांदा चौथाई सदीके टिये




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