ग्राम - सुधार | gram sudhar

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gram sudhar  by श्री हरिनारायण - Shree Harinarayan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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याम-सुधार [ स्थान--सुधारक प्रसाद की कुटिया । गाँव के बहुत से भादमों बेठे हैं सुधारक प्रसाद--महतो ! आज तुम दिन भर न दीख पड़े । सुगन महतो--क्या करें भेया, आज न मालूम किसका मुँह देखैकर उठे थे कि सबेरे सबेरे धुरहु साहब से काम पड़ गया! पहले सर्ले कुछ खबर न थी, हमारे ही दरवाजे पर आ घमके । क्या कहें, हम तो बड़े फेर में पढ़ गए। सु० प्र०--भाई ! यह घुरहु साहब कौन हैं। ओर किस फेर में पड़ गए९ सु० म०--यह सरकारी अफसर ओर एक हाकिम ही है। जहाँ जहाँ घूर-गन्दगी देखते हँ--हटवाते फिरते हैँ। हमारे सकान के सामझ्ले भी बहुत सा धूर पड़ा था-महल्ले भर के लोग भी यहीं फेंकते थे भोर हम भी छोड़ देते थे फि अखाढ़ में खाद के काम आयेगा। कुछ फायदा ही होगा-पर आज लेने के देने पड़ गए। बहुत बिगड़े ओर तुरन्त साफ करने का हुक्म दिया- नदीं तो फोजदारी चलार्वेगे । क्या करं, एक घंटे १




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