कबूरी | Koobri

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Book Image : कबूरी  - Koobri
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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दुबरी हती जो क्वौ कूरो उपेक्षिता सी,ताहि कवि समवे श्रनरुप करिदीनौ है च कं चरित्र की पवित्रता विचित्र मित्र !चित्र खींच गौरव गुमान অহি दीनो है ॥ छन्द लँ विभिन्न खंड कान्यहु श्रवत कं,नव सर्ग माँहि नव रस जरि दीनौहै॥ शक-एक पद को उठाइ रस घोरि-धोरि,क्राव्य की सुधा में बोरि-बोरि धरि दीनो है ।|प्रियतम दत्त चतुर्वेदी ““चच्चनःघन्य गोपा, अमला भी धन्य हसौ कार! कवि-कलम से कीति उतकी भ्रमर श्रपरपार ॥पर कुरूपा कबरी की कथा करुणापुं। कवि-कलम से कल तलक भी जो न थी संपूर्ण ॥।आज अपने रूप में कर भाव का স্ুক্রাহ। . बहु मुखर ब्रजभारती में हुई पहिली बार +--जीवन प्रकाश जोशी>




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