जलवार राज्य के दीवान | Jalawar Rajy Ke Diwan

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Jalawar Rajy Ke Diwan by महावीर प्रसाद द्विवेदी - Mahavir Prasad Dwivedi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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विपय-घची । १३ नम्बर विपय पृष्ठ ७५१--अपना शासन भाप फरने के छिए बचपन ही से भले बुरे परिणामों के तज़रिवे की ज़रूरत बेटे „ २७४ ५२-ख्ड्क म ड पोर स्येच्छावार स्वाधीनता के ग्रंकुर है. २७६ पर्े--उत्तम शिक्षा-पद्धति के लिए अध्ययन, कल्पना-चातुय्य, 14 शान्ति प्रार आत्मनिश्रद्द की ज़रूरत রি ১ হও ५४-यह शिक्षा-पद्धति माँ-चाप ঈাং অন্নাল হানা ক ভিত मड़ुल-जनक हैँ টু ५ २७९. चौथा प्रकरण (शारीरिक शिक्षा ) १--जानपरों के पालने, उन्हें सघाने या उनकी धंश-दूद्धि करने का अधिकांश आर्दामियां को दाक़ होता है ... 2৫ २--प्रपने बच्चों के खाने पीते इत्यादि की देखभाल करना प्रायः छोग पुरुषत्य में बद्दा छगाना समभतते हैं ১ ৫ इ--ज्ानवर्रो के पालन-पापण में वेदद चाव भार अपने घाल- घद्चों के पालन-पेपण् में बेहद वेपरधादी না २८४ ४-जावन-निर्याद के कपिं म महनत वदती ज्ञाती है। उसे सष्ठ सकने के लिए सुदृढ़ शरीर की ज़रूरत ... २८५ स--दारोत्रक दिक्षा की तरफ रोगों का ध्यान अब कुछ कुछ जाने लगा है. क्र २८६ ६जछड़के की शारीरिक शिक्षा वैश्ानिक सिद्धान्तों के अनु „ सार दानी चाद्िष र २८७ ७--सेखार की कोर स्थिति पकसी नटी रहती । उसमे हमेशा घढ़ाव-उतार लगा रहता दे... २८८ <--प्रधिक खा जाने की अपेक्षा भूसे रहना विद्येप दानिकारी है. २९० ६--भूख भर खाने से द्वानि नहों। साने के विपय में पशु, पक्षी, मनुष्य-घाल, घृद्ध: युधा-सबकी भार्गदशक छुपा है নল म ... २९१




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