श्रीप्रवचनसारटीका भाग 2 | Shri Pravachanasaar Teeka Volume-2
श्रेणी : जैन धर्म / Jain Dharm

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
15 MB
कुल पष्ठ :
420
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)१८
३६
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४५९
४६
४७
4४
६५
शक
17৪७९
<८
९.9
९.४शुद्धा शुद्धियत्र ।सद्द
होने
लायग्ग
उनको
अवस्थामई
जटलयहां अरहंत....धरीन्य
प्रतभिज्ञाग्र
होती है-
क्रणएसीपयोवतद् भाव
अतदमाचसो द्वव्यकी ...,इन द्रव्य
स्येत स्य
सदसदभाव
शुद्धोपयीगशुद्धहोते हुए
लोयग्ग
उनक्री
अवत्था নই
भट(यहां भरहंत पनेसेमतलब है)व्यय प्रौन्यप्रयभिन्नाय
होता है-
कारण
रेषा
प्याय
तदभाव
अतदभाषपयौयकी सत्ता है सो,द्रन्यकी सत्ता
द्रव्य
स्येतरस्य
50151
झुद्धोपयोग
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