गीता प्रवचन | Gita Pravachan

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आचार्य विनोबा भावे - Acharya Vinoba Bhave

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हरिभाऊ उपाध्याय - Haribhau Upadhyaya

हरिभाऊ उपाध्याय का जन्म मध्य प्रदेश के उज्जैन के भवरासा में सन १८९२ ई० में हुआ।

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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पहला भ्र्याय ७ नही ह कि जिसे बडा समकर ग्रहण करे व छोटा समभकरे छोड दे । वस्तुत वह्‌ न बडा होता है, न छोटा । वह हमारे न्यौत भरका होता है । श्रेयान्‌ स्वधर्मो विगुण ' इस गीता-वचनमे धर्मं शन्दका श्र्थं हिदू-घमं, इस्लाम, ईसाई-धर्म आदि जैसा नहीं हैं । प्रत्येक व्यक्तिका अपना भिन्न- भिन्न धर्म है। मेरे सामने यहा जो दो सौ व्यक्ति मौजूद हैं उनके दो सौ धर है । मेरा धर्म भी जो दस वर्ष पहले था वह आज नही है । श्राजका दस वर्ष बाद नहीं रहनेका | चितन और अनुभवसे जैसे-जेसे वृत्तिया बदलती जाती हे, वैसे-वंसे पहलेका धर्म छुटता जाता हैं व नवीन धर्म प्राप्न होता जाता है । हठ पकडकर बु भी नही करना ह । दूसरेका धर्म भले ही श्रेष्ठ मालूम हो, उसे ग्रहण करनेमे मेरा कल्याण नहीं है । सूर्यका प्रकाश मुझे प्रिय है । उस प्रकाशसे में बढता रहता हू । सूर्य मुझे बदनीय भी है । परतु इसलिए यदि में पृथ्यीपर रहना छोडकर उसके पास जाना चाहगा तो जलकर खाक हो रहुगा । इसके विपरीत भने ही पृथ्वीपर रहना विगुण हो, सूर्यंके सामने पृथ्वी बिलकूल तुच्छ हो, बह स्वय-पकाग न हो, तो भी जवतक सूर्यके तेजको सहन करने का सामर्थ्यं मुभमे न प्राजाय तब तक सूर्यस दूर पृथ्वी पर रहकर ही मू श्रपना विकास करलेनाहोगा । मछलियोको यदि कोई कहे कि 'पानीसे दूध कीमती है, तुम दूधमे रहने चलो, तो क्या मछलिया उसे मजूर करेगी ? मछलिया तो पानीमे ही जी सकती है, दूधमे मर जायगी । दूसरेका धर्म सरल मालूम हो तो भी उसे ग्रहण नहीं करना है । बहुत बार सरलता ग्राभासमात्र ही होती है । धर-गृहस्थीमें ब[ल-बच्चोंकी ठीक सभाल नही की जाती, इसलिए ऊबकर यदि कोई गृहस्य सन्यास ले ले तो वह ढोग होगा व भारी भी पडेगा । मौका पाते ही उसकी वासनाए जोर पकडेगी । ससारका बोझ उठाया नही जाता, इसलिए जगलमें जाने वाना पहले वहा छोटी-सी कूटिया बनावेगा । फिर उसकी रक्षाके लिए बाड लगवेगा । एसा करते-करते वहा भी उसे सवाया ससार खड़ा करनेकी नौबत आजायगी । यदि सचमुच मनमे वैराग्यवृत्ति हो तो फिर सन्यासभी कौन कटिन बतत है । सन्यासक ्रासान बनानेवाले स्मृति-बचन तो हैं




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