प्राकृतमार्गोपदेशिका | Prakrit Margo Padeshika

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Prakrit Margo Padeshika by बेचरदास जीवराज दोषी - Bechardas Jeevraj Doshi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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[ই] जेटलों फेर गोहिल्वाडी अने झालावाड़ी भाषामां के या चशोतरनी अने प्ंयमहालनी भाषामां छे तेटलो ज फेश प्रकृतभाषामां - पाली अने प्राकृतमां, मागधी अने सोरसेनी बगेरेमां - छे तेथी एक मात्र प्राकृतने सारी रीते शीखी जवाथी' पाली वरर बीजी बीजी पाचीन श्ाखीय भाषाओं शान सहेज़े सदहेजे थई्द जय ऊ. ` मूझ जेन सिद्धांतो प्राकृतभाषामां छे मने बौद सिद्धातो पाली भाषामां छे तेथी बोद्ध अने जेन धमेना अभ्यासीदय तो आ भाषा जरूर शीखी लेवी ज्ोइए. वर्णविज्ञान स्वरा हस्व दीं उच्चारणोनुं स्थान अ आ कंड अने नासिकां ১ तालु अने नासिका ड ऊ ओए-होठ-अने नासिका অ+হশ্হ कंठ अने ताल तथा नासिकौ अ+उत्झो कंठ अने होठ तथा नासिका स्वस्‍नुं प्लुत उच्चारण प्राकृतभांषाना व्यवहारमांथी जतं रघुं छे. जे व्रणे, कंडमांथी बोलाय ते कंख्य, ताल्युमांथी बोलाय ते साङ्व्य, भोच्ठम्गथी वोखाय ते ओष्ठ्य अने ण बन्नेमांथी बोखाय ते कं्यलार्व्य के कंट्योष्ठ वथा नालिकाममांथी बोखाय ते नासिक्य-अलुनासिक कटेवाय. कैट बटे गदु, বাস্তু হাক, বানু, सस्‍्वरो बचा অভুনাতিক छे पण तेमनं ते जातुं उच्चा- रण स्थरूपिशेत्रमां ज थाय ऊ, वपे नदि.




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