पुरुष रोग चिकित्सा | Purush Rog Chikitsa

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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पुरुष का महत्वडा० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी बेच, के ३०/६ घासीटोला वारागसी० 6 ० ना दर है हेहैंअनेक सहाकाव्यो के सम्पादक, विभिन्‍न िंपयों के मो लिक' ग्रन्थों के रचयिता, आलोचक, टीकाकार, सस्कुन के विविध पत्र पश्रिकामों के सम्माननीय लेखक -डॉ० अह्मानन्द 'विपाठी मूलत नैनीताल के निवासी हैं । विगत ४० बर्षो से, भापने विषयक ज्ञानपिपासा की शान्ति के लिये कांधी, को . सपना उपासना क्षेत्र चना लिया है । काशी से जन्यत्र अनेक सम्मानित पदों' का समय समय पर भास्बाद करने के बाद भी जापका मटल, काशी के प्रति है ।गाप भायुवेंद, व्याकरण, साहित्य, ज्योतिष भादि विषयों के पिद्वान हैं। चरक स्रहिता पर आप द्वारा. लिखित “चरक-चन्द्रिका' हिन्दी टीका आपकी चतुरस प्रतिभा का सम्यक्‌ परिचय देती है । ,आयुर्वद के विद्वान कविराज लोलिम्बराज के सम्पूर्ण साहित्य को “प्रकाश में लाकर .आपने जो गायुर्वेद की सेवा की है, चह्ठ आपकी अनुपम देन है । यही कारण है कि. मापकी अनेक रचनाएं समय-समय पर राजकीय सस्वाओों द्वारा पुरस्कृत हो चुकी हैं। ,. .,. आप 'घन्वन्तरि' के जाने माने पुराने स्थायी शाधार स्तम्भ लेखक हैं । धन्बन्तरि को भापते अपना ही समझा'है । !घन्वन्तरि' परिवार मापके प्रति विविध अपेक्षा रखते ई जो मुखत आयुर्वेद के जिकास के प्रति हो+ विविध विषयों के, उत्कृष्ट विद्वान को हमारा नमस्कार । गा ' वश भथोक भाई तलाविया,सारद्वाज|नलपुरुष शब्द का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है, बह बेदिक करते हैं, उस का सूचक, मह 'पूरुष' 'शब्द है बाडमय में ईप्वर तथा आत्मा से सम्बन्धित है गौर मह 'पुरमति भाप्यायते' इस अग-का जॉतक है । लोकिक साहित्य में इससे भिन्न है । कुल मिलाकर इसका -द्शनझास्त्र की दृष्टि ले बुर्ष--बेंदिक बाहमय, को क्षेत्र है परमात्मा से लेकर कीट पर्यन्त । प्रस्तुत लिबन्ध में. तल स्पर्शी दृष्टि से देखने जोर समझने के सिने ही दशन हम विविध हृष्टिकोणो को लेकर इसी विषय की 'चर्घा - शास्त्रों ,का उद्भव माना जाता है।. छत. हम सर्वप्रथम करेंगे। कोष साहित्य में यह शब्द द्स्व दीष॑ भेद से दो. एक बदिक मन्त्र. को प्रस्तुत . करते हैं-'पुरुष एवेद शर्ग प्रकार का हृष्टिगोचर होता है--१ पुरुष और पुरुष ।.... यद्भूत .यच्व. भवामु,' शऋरवेद, का पुदुष शब्द की निरुक्ति-- -पुरुवोत्तब योग नामक १४ वाँ अध्याय उसी परम पुरुष की _.. पुरुष--'पुरति, पुरअग्रगमने घातु से उणादि 'कुषनु' करता है। इसके मतिरिक्त गीता अध्माम ८1२९ तमा 91७9 प्रत्यय करने पर “पुरुष शब्द” सिद्ध होता है। १३।२०,२१ का भी,इस प्रसंग में निनेचन महत्वपूर्ण है । आप्यायने घातु से बाहुलकाद्‌ उणादि कुषन्‌ प्रतय साश्ष्यमत--ससार की. रचना करने. बाली मूंबेभूत करने पर दीर्भादिं 'पुरुष' शब्द सिद्ध होता है । प्रकृति किसी की काय नहीं है, अपितु वह समस्त चराजर में कहे गये जिस प्रकार एक बूखरे का पूरण रूप विश्व की कारण है शोर सहद, मादि सात.ः ४१ ] कक. अर11 पैक




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