वस्तुविज्ञानसार | Bastuvigyanasaar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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अनन्त पुरुषार्थ [७ स्वयं उपस्थित होते ही है। सर्वशदेव ने अपने शान में यह ठेखा है| कि ३ बजे अमुक परमाणुझों की काली अवस्था होनी है, ओर यदि निमि का अभाव हाने से भथवा निमित्त के विलम्ब से झाने के कारण वह अबस्था विलम्ब से हा ते सवैज्ञ का ज्ञान गलत ठहरेगा; किन्तु यह असम्भव है | जिम समय वस्तु की जा कमबद्ध श्रवस्या हानी हानी है, उस समय निमित्त उपस्थित न है| यह हा ही नहीं सकता। निमित्त होता तो है किन्तु पह कुछ करता नहीं है | यौ पुद्रन का दृष्टात दिया गया ह। इसी प्रकार अब जीव का टृष्ट/त देकर सममातें है | किसी जीव के केवलशान प्रग८ होना हे। ओर शरीर में वजह्त्रपभनाराचसहनन न हे ते केवलज्ञान रुक जायेगा, ऐसी मान्यता बिल्कुल मसत्य एवं पराधीन दृष्टि वाले की है | जीव केवलझान प्राप्त करने की तैयारी भे हे। भोर शरीर में वज़ब्षभनाराजसेहनन न हो ऐसा कदावि नहीं है| सकता । जद उपादान स्वय सन्नद्ध हे वहाँ निमित्त स्वथ उपस्थित हाता ही है । जिम समय उपादान कोयं शूप मे परिणत हता ह उमी समय दूसरी वस्तु निर्मिन्त रूप उपस्थित होती है। निमित्त बाद में आता हा से! बात नहीं है। जिस समय उपादान क काथ हेाता है उसी समय निमित्त की उपस्थिति भी ह्वाती हे, ऐसा होने पर भी निमित्त--उपादान के काथ में किसी भी भ्रकार লী सहायता, भ्रसर प्रभाव अथवा परिवतेन नहीं करता। यह नहीं हा सकता कि निमित्त न हो। ओर निमित्त स काये है ऐसा भी नहीं हा सकता | चतन मथवा जड द्रव्य में उसकी अपनी जे! क्रमबद्ध ग्रवस्था जब हानी हाती हैँ तब अनुकूल निमित्त उपस्थित हेते हैं | ऐसा जे स्वाधीन द्वष्टि का विषय है उसे सम्यम्टष्टि ही जानता है, मिथ्याहृष्टिये। के वस्तु की स्वतत्रता की प्रतीति नहीं हेती, इसलिये उनकी द्रष्टि निमित्त पर जाती है| अशानी के वस्तुस्वरूप का यथार्थ ज्ञान नही है, इसलिये ब॒सस्‍्तु बी क्रमबद्ध पयाय में शका करता है कि यद ऐसा कैसे हे! गया ! उसे सर्वहञ के शान की भोर वस्तु की स्वतत्रता की प्रतीति नहीं है, ज्ञानी के वस्तुस्थरूप




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