गीत - फरोश | Geet Pharos

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Book Image : गीत - फरोश - Geet Pharos
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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कविक़छम अपनी साध, ओर मन की वात बिलकुल ठीक कह एकाघ ।ये कि तेरी-भर न हो तो कह,और बहते बने सादे ढंग से तो वह ।जिस तरह हम बोलते हें, उस तरह त्‌ लिख, ओर इसके बाद भी हमसे बढ़ा त्‌ दिख । चीज़ ऐसी दे कि जिसका स्वाद सिर चढ़ जाए बीज ऐसा वो कि जिसकी बेल वन बढ़ जाए ! फल लगें एसे कि सुख-रस, सार, और समर्थ ग्राण-संचारी कि शोभा-भर न जिसका घर्थ !टे मत पैदा करे गति तीर की अपना, पाप को कर लक्ष्य कर दे झूठ को सपना । विध्य, रेवा, फूल, फल बरसात या गरमी, प्यार प्रिय का, कप्ट-कारा, क्रोध या नरमी, देश या कि विदेश, मेना हो कि तेरा हो _ हो विदद विस्तार, चह एक घेरा हो,तू जिसे छू दे दिशा कल्याण हो उसकी,तू जिसे गा दे सदा वरदान हो उसकी ।जनवरी, १९३०गीत-फरोज्ञ




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