माखनलाल चतुर्वेदी यात्रा-पुरुष | Makahan Lal Chaturvedi Yatra Purus

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Makahan Lal Chaturvedi Yatra Purus by श्री कान्त - Shri Kant

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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वास्तविक दृष्टि से विचार किया है। उन्होने लिखा है, “ (चतुर्वेदीजी की) भाषा में अब न लिखूँ, पर उसका मैं सम्मान करता हूँ. वह भाषा को एक जीवन्त, प्रवहमान ओर सतत परिवतंनशील साधन के रूप मे ही बरतते भ्राये-एेसे साधन के, जिसके बदलते रहने को उन्होने स्वीकार भी किया और साथ ही प्रेरित भी। इसीलिए उनकी भाषा अनगढ रही, श्रस्थिर रही, ठेठ शब्दों को भी उतनी ही सहजता से श्रपनाती रही जितनी से सस्कारी रन्दो को, जो चाहे सस्कृतके हो चाहे फारसी के, पर इस सब के साथ सहज रही, कृत्रिम कभी नही हुई, हिन्दी ही रही, यद्यपि बनती हुई हिन्दी * (पृष्ठ ४८०) अज्ञेयजी ने माखनलालजी के भारतीय आत्मा से तादात्म्य के पक्ष को उकेरते हुए आगे कहा है --/(चतुर्वेदीजी की भाषा मे) मेंजाव की कमी रही तो उसी अथं मे भौर उसी हद तक जिसमे भौर जिस सीमा तक हिन्दी समाज मे मंजावकी कमी है. एक भारतीय आत्मा भारतीय ही है और रही है ““ (पृष्ठ ४८१) अज्ञेयजी का उपर्युक्त वक्तव्य अपने परिवेश के प्रति जागरूक और समपित, माखनलालजी के गतिशील व्यक्तित्व की ओर भी सकेत कर रहा है। व्यक्तित्व की यह दीप्ति ही वह महत्त्वपूर्ण कारण थी कि जिसके कारण हिन्दी के प्रेरणाशील व्यक्तित्व डॉ० शिवमगलसिह 'सुमन' ने लिखा है, “(उनकी ) कविता प्रयत्न-साध्य कभी नही रही, (उनके) स्वरो मे कवि-धमं ओर जीवन-धमे का समाहार हो गया था 1” (पृष्ठ ५) । समय से आगे जीवन, जिजीविषा ओर अविभाजित समय को ग्रहण करते रहने की पुरज्ञोर क्षमता ही माखनलालजी के चिर-तारुण्य का रहुस्योद्घाटन करती है । यह्‌ तारुण्य उन्हं सदा ही समय से भ्रागे' रखता रहा । उनके व्यक्तित्व के इस पहलू पर इस ग्रन्थ मे अनेकं लेखको ने अपने विचार व्यक्त किये है । मै हिन्दी समीक्षा के भीष्म श्रद्धेय श्री पदुमलाल पुन्नालाल बख्श के लेख से एक उद्धरण मात्र सकेत रूप मे दे रहा हूं । उन्होने लिखा है, “` “- १६१२ से जब मै अपनी एक कविता लेकर हिन्दी साहित्य के क्षेत्र मे प्रविष्ट हुमा, तब से लेकर आज तक जिस एक कवि की रवना-दीप्ति को काल की गति लुप्त न कर सकी वह्‌ माखनलाल चतुर्वेदी ही है । चतु्ेदीजी क्या द्विवेदी युग के कवि है, क्या वे छायावाद या रहस्यवाद-युग के कवि है, क्या वे वर्तमान प्रगतिवाद के कवि है, यह कहना सचमुच कठिन है। जब १. द्रष्टव्य --शभ्री सुमिन्नानंदन पत का यह वाक्य कि (माखनलालजी) जैसा सहज कवि इस युग में दूसरा न हुआ । (२० दिसम्बर, १६६५ का पत्र) ( १८ )




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