ज्ञान की गरिमा | Gyan Ki Garima

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Gyan Ki Garima by बलदेव उपाध्याय - Baldev upadhayay

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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ज्ञान की गरिमा | हे हू नारी का तेज १ मेरा नाम अपाला है। मैं महि ्रत्रि कीपुत्रीहु। मेरे माता-पिता की बडी श्रभिलापा थी कि उनके सूने घर को सतान का जन्म सनाथ करे । घर भर मे विपाद की एक गहरी रेखा छायी रहती थी। मेरा जन्म होते ही उस आश्रम मे प्रसन्नता की सरिता बहने लगी, हर्ष का दीपक जल उठा, जिससे कोना- कोना प्रकाश से उदभासित हो गया । मेरा शेशव ऋषि-बालको के सग मे बीता मेरे बाल्यावस्थामे प्रवे करते ही पितृदेव के चित्त मे चिन्ता ने घर किया जव उन्होने मेरे सुन्दर शरीर पर दिवत्र (वेत कुष्ठ) के छोटे-छोटे छीटे देखे । हाय 1 रमणीय रूप को इन रिवत्र के उजले चिल्ल ने सदा के लिए कलकित कर डाला । पिताजी ने अपनी शक्ति भर इन्हे दूर करने का श्रश्नात परिश्रम किया तथा निपुण वैद्यो के श्रच्रुक श्रनुलेपनो का लेप लगाया परतु फल एकदम उलटा हुआ । ग्रौषध के प्रयोगो के साथ-साथ विपरीत अनुपात से मेरी व्याधि वढने लगी, छोटे-छौटे छीटे बडे घव्वो के समान दीख पडने लगे । श्रततो- गत्वा मेरे पिता ने अ्रौषव का प्रयोग चिल्कूुल छोड दिया ।




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