रीती मुक्त कवि बोधा की काव्य भाषा का अध्ययन | Riti Mukt Kavi Bodha Ki Kavya Bhasha Ka Adhyyan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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৮154 दोनों अनुभव क्षेत्रों को दृष्टितत रखते हुए किया जाता है। जब कवि अनुभूति व॒ अभिव्यक्ति की चरम-सीमा पार कर जाता है तो उपमेय का उल्लेख किये बिना ही सादृष्यमूलक उपमान की योजना द्वारा उपमेय और उससे सम्बद्ध मूलानुभूति को पूर्णरूपेण व्यंजित कर देता है। ऐसी दशा मँ अप्रस्तुत प्रतीक के रूप में परिवर्तित हो जाता है। इन विवेचनों से यह स्पष्ट हो जाता है कि उपमानात्मक होने के कारण कविता की भाषा अलंकारिक ओर प्रतीकात्मक होती है लयात्मकता कविता की भाषा का मुख्य एवं अन्तर्वतीं तत्व है। लय को धारण करने वाले भावानुकूल वर्ण-विन्यास, छन्द, तुक आदि तत्व मूलानुभूति एवं उसकी अभिव्यक्ति के स्वरूप के नियमन व॒ निर्धारण | में सहायक होते हैं। विदेशी प्रभाव के फलस्वरूप कविता को लयहीन बनाकर प्रकट किये जाने की आशंका व्यक्त करते हुए तथा कविता में लय ओर नाद-सौन्दर्य की महत्ता पर विचार व्यक्त करते हुए आचा्थ रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है -- “अतः नाद-सौन्दर्य का योग भी कविता का पूर्ण स्वरूप खड़ा करने के लिए कुछ न कुछ आवश्यक होता है। इसे हम बिल्कुल हटा नहीं सकते! जो अ्त्यानुप्रास को फालतू समझते हैं, वे छन्द को पकडे रहते है, जो छन्द को भी फालतू समझते हैं। वे लय में तीन होने का प्रयास करते हैं। संस्कृत से सम्बन्ध रखने वाली भाषाओं में नाद-सौन्दर्य के समावेश के लिए बहुत अवकाश है। अतः अंग्रेजी आदि अन्य भाषाओं की देखादेखी, जिनमें इसके लिए कम जगह है, अपनी कविता को हम इस विशेषता से वंचित कैसे कर सकते हैं? * वास्तव में लयहीनता का गद्यात्मकता कविता की मूल प्रकृति के ही प्रतिकूल है। कविता में मुक्त छन्द मेँ किसी निश्चित छन्द के आद्योपान्त निर्वाह के बन्धन से छुटकारा मिल सकता है, लेकिन लय से ऐसा संभव । नहीं है। कविता में लय का ऐसा संगुम्फन व प्रवाह रहता है कि अधिकंश चिन्तामणि [भाग-एक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, पृ0 - 144




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