प्राकृत-व्याकरणम भाग - 2 | Prakart Vyakarn Bhag-2

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Prakart Vyakarn Bhag-2 by रतनलाल संघवी - Ratanlal Sanghavi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(८९१ ४. पेशाची-भाषा-वर्णन ३०३ से ३२४ ५ चूलिका-पैशाचिक-मापा-प्रदशन ३२५ से ३२८ ६ अपभ्रश-भाषा-स्वरूप-विधान ३२९ से ४४६ ও प्राकृत आदि मापाभो मे “त्यत्यय” विधान ४४७ = शोप साधनिका में सस्कृतवत्‌” का सविघान ४४८ ४६१ ४७१ ४७५ २९१ ५६२ नोट -(१) अपदेश प्राप्त प्राहत-घातुबा को तीन श्रेणियों मे विभाजित क्या जा सकता है, जो कि क्रम से इस प्रकार हैं -- (१) कुछ ' तत्सम” की कोटि की है, (२) कुछ 'तद्भव” रूप वाली हैं और (३) कु देशज” पेणो वाली हैं । (२) मूल्त प्राकृत-भाषा का नाम महाराष्ट्री” प्राइत है और शेष भाषाएँ सहयोगिनी प्राइत-मापाएँ कही जा सकती हैं | (३) जैन-प्रागमा को भाषा मूलत “अध-मागधी' है, परन्तु इसका आधार *महाराष्ट्री-प्राइत” ही है ।




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