जीव जगत की कहानिया | Jiv Jagat Ki Kahaniya

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Jiv Jagat Ki Kahaniya by प्रो.पं. मन्तेय फ़ेल - Prof. Pt. Mantey Fel

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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उन्होने इस शोर से आसमान को सर पर उठा रखा है। उनको पसद न आनेवाली कोई भी बात हो जाये, तो वे यही करती ह। चाहे बिजली तडके, गोली चले -उनको अच्छी न लगनेवाली कोई भी बात हो जाये, तो वे इसी तरह रिरियाना शुरू कर देती ह- उनके बाल उलझे होते हें, वे पेडो के ठठो पर सिरो को पजो में पकडकर बेठ जाती ह और दुखभरी आवाज़ मे चिल्लाने लगती हैं तुम त्रुम_! आज वें इसलिए रो रही हैं कि उहे आसानी से और खाना नही मिल रहा है। अरब उन्हें उसकी तलाश में ताइगा जाना होगा। ” क्षण भर चुप रहने के बाद उन्होने मेरे साथियों से पूछा, “खर, श्राप लोग तो वैज्ञानिक हें, मगर क्या श्राप मेरे इस सवाल का जवाब दे सकते है-८० किलो भारी एक पत्थर को कसे खीचकर नाव में डाले कि जिससे नाव पानी में ऐन वहा रह सके, जहा स्टरलेटो के झुड है? ” नौजवानो के जवाब सुनकर वह हस पडे और बोले, “ ग्रगर आपने ऐसा किया, तो आप सीधे पेदे में जा बेठेगे। फिर वह मुझसे बोले, “क्या आप यह कर सकते है” ग्राप तो हर बात जानते हा” मेरे खयाल से म॒ कर सक्ता हृ,” मैने जवाब विया। “बसे मेने पहले कभी यह किया नहीं है। पानी में पत्थर बहुत भारी नही होता। जोर से खीचने से पत्थर उछल पडेगा और सीधे पानी के बाहर निकल आयेगा। आपको सिर्फ यही करना होगा कि उसे जल्‍दी से नाव में खीच ले और फिर नाव को प्रवाह में सीधा करने के लिए चप्पुओं को सभाल ले।” १६




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