गीता का भक्तियोग | Geeta ka Bhaktiyog

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Geeta ka Bhaktiyog by स्वामी रामसुखदास - Swami Ramsukhdas

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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1 श्रीहरि ॥ प्रक्कथनं पराक्तनमद्धन्धं परब्रह्म नराकृति 1 सौन्यर्यसार सर्वस्य चन्द्रे नन्दात्मज महः ॥ प्रपन्नपारिजाताय तोर््वेन्ङपाणये । नानपुदाय कृष्णाय गीताखतददे गमः ॥ লবন देव ऊंसचाणूरमद्रनम्‌ 1 देवफीपरमानन्द कृष्ण धनहे जगहुसम ॥ धंशीविनृप्तिकरान्नपनीर दाभाद पीताम्परादरुणविश्पफलाधरोष्टात्‌ । पूर्णेन्दुसन्द्रसुसाद्रविख्दुनेवात्‌ कृष्णात्परं किमपि तत््वमह न जाने ॥ যাঘদিবজননজ पुरुष जरन्तं खचिन्तयामि निखिले जगति स्फुरन्तम्‌ 1 तावद्‌ वद्ात्‌ स्फुरति हम्त हृदन्तरेमे गोपस्य कोऽपि शिद्यरञ्जनपुञमन्जुः ॥ श्रीमद्भगपद्गीता एक अन्यन्त रिव्क्षण और अछोफिक ग्रन्य हे । चारो वेदोका सार उपनिपद्‌ & और उपनिपदोफा भी सार श्रीमद्भगयद्गीता ६ । यह खय भी अद्ररियाका बर्गव होनेसे उपनिपद्‌- खरूप और श्रीमगयानूक़ी याणी होनेसे बेद-खम्धप है । इसमें खय श्रीभगयान्‌ने अपने प्रिय सखा अजुनकों अपने हृदयके गूढ़ भाय जिशेषरूपसे ऊह़े हैं । जैसे वेदोमें तीन काग्ट हैं---ऊर्मकाण्ट, उपासनाकाण्ड और ज्ञानराग्ड, वैसे ही गीतामें मी तीन कार्ड हैं । गीताफ़ा पढ़छा पदक [न




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