एक मौलिक दर्शन | Ek Maulik Drashan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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आम शर्मा जी ने सौहादवश यह इच्छा प्रकट की है कि उनकी इस पुस्तक को में पाठकों के समक्ष रखू । में यहाँ कुछ द्विविधाग्रस्त- साहो गया हं क्योकि संस्कृत साहित्य के द्वारा भारतीय विचार धारा से कुछ अंशों मे अभिज्ञ अ्रवश्य हो सका हूं, किन्तु भाषा का मुझे ज्ञान नही। जो हो, इस पुस्तक में जिन प्रश्नों पर विचार किया गया है, वे इतने व्यापक है कि यदि में उनके सम्बन्ध में यहाँ कुछ लिखता हं तो यह्‌ क्षन्तव्य होगा । उन त्को के द्वारा, जिनका मैं सर्वत्र समर्थन नहीं करता, शर्मा जी इस सिद्धान्त की सत्यता पर प्रकाश निक्षिप्त करते हं कि भौतिकवाद के द्वारा मानव और विश्व के अस्तित्व से समुत्पन्न प्रनों का समुचित उत्तर नही दिया जा सकेता क्योकि ग्राधनिकं विज्ञान कै साथ-साथ चलने का दावा जडवादी देन ही करता है ! शर्माजी यह दिखलाते है कि किस प्रकार वैज्ञानिक ज्ञानाजंन संकुचित एवं सापेक्ष है--हमारे अर को प्रावश्यकता- पूत्ति में कितना अ्स्‍क्षम है! वे इसका खण्डन नहीं करते कि प्रपने स्थान पर वह महत्त्वपूर्ण है, किन्तु हम लोगों को विश्वास दिलाते है कि वह जीवन प्रौर ज्ञान का एकमत्र या सर्वाक्कृष्ट साधन




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