उपहार | Uphaar

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Uphaar by सैयद महमूद अहमद - Saiyad Mahmood Ahamad

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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उदारता १३. सत्र दुबले-पतले मरियल से हो जायें--चिड़चिड़े, कड़वे और शुष्क । और यह शुष्कता फैनती-फैलती यहाँ तक फैले कि पृथ्वी पर शुष्कता के अतिस्क्ति और कुछ दिखाई ही न दे.। - “और जो कोई हंसे तो गिरफ्तार कर लिया जाय । वहाँ रोना-पीटना ही सुनाई दे चारों ओर ।” किशवर ने कहा | एक ऊँचा ठट्ठाका पड़ा । त्र किशवर की पारी थी । वह बोली--ओऔर मेरा जी चाहता है कि खूब लाल-सा गोल-मोल चेहरा हो जाय और बहुत वजन बढ़ जाय | ऐसी स्वस्थ हो जाऊँ कि बस लोग देखा करें |” मैंने उसकी हँसी उडाई--“लडकियों तो हर समय दुबे होने को चिन्ता में रहती हैं और ये हैं कि बिल्कुल उलटी। यह भी नहीं कि बहुत चुबली-यतली हैं; अपनी बदिन म सज से स्वस्थ और ईसमुख । ^ ग्राकॉज्षा मो अताई तो क्या बताई । अचछी इसको खिल्लो उडाई जायगी--मैंने मन मे कहा । अत्र सब्र मेरी ओर देखने लगे। मेरा आखिरी नम्बर था। मैने बड़ी उपेक्षा दिखाते हुये कहा--“साइब मेरा तो यही जी करता है कि किसी दिन फोज में कप्तान बनूँ। सिर पर नोंकदार ठेपी हो, बाहों पर स्टार लगे हों। क्या 'शान होती है वर्दी की |”? उमा दिन मैंने सोच-साच कर एक चित्र चनाया। गोल-मटोल लाल-सी गेद ! मट-पोटे हाथ पांव, फुटबाल जेता चेश | नीचे लिखा--- एक महिला, आज से दो वर्ष ज्ाद !” यह चित्र किशवर को दे दिया | उसने ले लिय्य । इस प्रकार मानो कुछ हुआ ही नहीं | न्ध्या रमय मुके एक चित्र मिला) एकं लम्व्रा-सा बखनुमा आदमी जिसके कन्घे पर घोड़े की जीन थी और सिर पर एक फटा पुराना #




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