हिंदी रस गंगाधर | Hindi Ras Gangadhar

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गोकुलनाथ - Gokulnath

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श्रीपुरुषोत्तम शर्मा चतुर्वेदी - Shree Purushottam Sharma Chaturvedi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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[ १३ | तथा उसके पुत्र दाराशिकाह* की छत्रच्छाया मे ही व्यतीत हुआ धा । शाही जमाने के संस्कृव-पंडितों मे हम इन्हें परम भाग्यशाली मानते ई, क्योकि 'तख्तताऊसः श्रौर ताजमहल” आदि परम-रम्य वस्तुनो के वनवानेवाल्े और बड़ी भारी शान-शाकत से रहनेवाले सार्वमैौम शाहजहाँ के उस शक्रोपम वैभव के भोग मे इनका भी एक भाग था | 'संग्राम-सार”र और 'रस-रहस्य'र भादि भरथो के निर्माता, जयपुर-नरेश श्रीरामसिंहजी प्रथम के धित, बरजमाषा के सुप्रसिद्ध कवि माथुर चतुर्वेदी श्रोकुल्षपति मिश्र, जो आगरे के रहनेवाले थे, इनके शिष्य थे और इन पर उनकी झत्यंत श्रद्धा- भक्ति थी। इसके प्रमाण मे इम सिंश्राम-सार! से दे पद्च उद्धृत करते हैं। बे ये हैं-- शब्द-जोग में शेष, न्याय गोतम कनाद मुनि । सांख्य कपिल, अरु व्यास ब्रह्मपथ, कर्म॑नु जैमिनि ॥ वेद्‌ श्चग-जलुत पड़े, शील-तप शपि वसिष्ठ सम । अलंकार-रस-रूप अष्टभापा-कविता-क्षम ॥ १--“जगढ़ामरण” नामक ग्रंथ मे दाराशिकाह का ही वर्णन है । २---समाम-सार' वि० सँ १७३३ मे बना था, यह म० म० ओगिरिधरशर्मा चतुर्वेदीजी के पिता कविवर श्री गोकुलचंद्रजी का कथन है । ३---.'रस-रहस्थ” का समय ते कवि ने ख्यं ही लिखा है---'सबत्‌ सन्नह सौं वरष ( अरु ) बींते सत्ताईसल । कातिक वदी एकादशी बार बरनि वानीश ।? ( रसरस्य, अष्टम -वृत्तांत, पद्य २११ )




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