शुद्धाद्वैतदर्शन भाग - 2 | Suddhadwaitadarshan Bhag - 2

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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करशा 6इसलिये ब्रह्म निर्विशेष है यह बात युक्तिसे अच्छीतरह सिद्ध होती है। 'घण्रोडस्ति पटोस्ति ( घट है-पट है )” 'पटोज्नुभूयते घटो- उनुभूयते (घटपटकाअनुभव)' (किंवा घटपटको में जानता हूं) इत्यादि खलमें माठुम पडता है कि घटपट आदि समग्र पदाथे जिसके अंदर आये हुए हैं वह सर्वव्यापक 'ज्ञानपदारथ” सबसे जुदाही है। घटपट आदि स्व पदार्थोके साथमें अनुभूति (ज्ञान) लगी हुईं है । घटोडस्ति' की जगह पयदिका व्यावर्तन (जुदाई) होती है ओर परणेस्ति' की जगह घटादिकी व्यावृत्ति (जुदाई) होती है। किन्तु अनुभव वा ज्ञान सबके साथ लगा है । उसकी व्यावृत्ति किसी अवस्थामें नही होती । ज्ञान खतत्र और सब प्रतत्र हैं | समय २ पर सर्व पदार्थ ज्ञानसे अलग होते रहते हें, किन्तु ज्ञान किसीसे जुदा नही होता । अथात्‌ ज्ञानकी सत्ता हमेशा है । अतएव खततन्र, अव्यावृत (जुदा न होता ) सर्वत्र अनुवर्तमान, और सबमें मिला हुआ, एक ज्ञानही परमारथ ओर नित्य सत्य है । ओर वारेसर ज्ञानसे जुदे होनेवाले, क्षणिक, पर- तंत्र, सवे पदार्थ, अपरमाथे ओर अनिल हैं, मिथ्या हैं। सत्ता और अलनुभूतिमेंभी किसीतरहका भेद नहीं है। क्योंकि अन्यो- न्याभाव कोही भेद कहते हैं । वह अभाव किसीके ग्रहण करनेमें आता नहीं । अतएव यह नहीं कह सक्ते कि सत्ता और अनुभूति अलग २ है। और अनुभूति एकही पदार्थ है। भेदमात्र अहण करनेमें नहीं आता अतएव यह कोई पदार्थही नहीं है। ओरतकके शांकर वादियोंमें थोडा थोडा मतभेद्‌ है उनमें किसीका केवलानु- भूति पक्ष हे ।




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