सूफीमत साधना और साहित्य | Suphimat Sadhana Aur Sahitya

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Suphimat Sadhana Aur Sahitya by रामपूजन तिवारी - Rampujan Tiwari

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डॉ राम पूजन तिवारी बिहार प्रदेश के भोजपुर जिला अंतर्गत बड़हरा प्रखंड के गंगा तटवर्ती इलाके के परशुरामपुर गांव के रहने वाले थे। उन्होंने कठिन संघर्ष के माध्यम से अपनी पढ़ाई पूरी की थी। डॉ राम पूजन तिवारी एक निम्न वर्ग के परिवार से आते थे। गांव में रहने के बावजूद डॉक्टर तिवारी ने अपने बुद्धि और विवेक के द्वारा कई किताबों की रचना की। आज के युवक उन्हें भूलते जा रहे हैं। इलाके के लोग आज भी उन्हें बड़े गर्व के साथ याद करते हैं। सूफी साहित्य के लिए विभिन्न सरकारों द्वारा उन्हें कई स्वर्ण पदक, सिल्वर पदक और ताम्र पदक से नवाजा है।

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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दो शब्द प्रस्तुत पुस्तक वक्तव्य-विपयके बारेमें मुझे विशेष कुछ नहीं कहना ই | उसके सम्बन्धर्में इतना ही कह सकता हूँ कि यूफीमतकों समझनेका अयास किया है और उसे ही पाठकोंके सम्मुख रख रहा हूँ | सहानु- भूति और श्रद्धा ेकर मेने सूफियोंके दृष्कोणकों समझनेकी গা की है | मेरी दृष्टिमं बिना इसके किसी भी विपयके ग्रति पूर्ण न्याय नहीं हो सकता । फिर भी निरपेक्ष रहकर ही वक्तव्य विषयको प्रस्तुत करनेकी चेश मैंने की है | एक दूसरी बातकी ओर भी ध्यान आकृष्ठ करना आव- ब्यक जान पड़ता है। सूफीमत तथा साधना अथवा अन्य किसी भी मध्ययुगीन साधना और मतको समझनेके लिए तत्कालीन वातावरण और मान्यताओंकी आँखोंसे ओझल होने देना अनुचित होगा । जायसी-सादित्यको समश्चनेकै लिए सन्‌ ५९५९ ई० क प्रारम्भ मेने सूपीमतका अध्ययन युरू किया । जायसी-सादिघयका अध्ययन तो जहका तहाँ रह गया सूफीमतकी जानकारी ही मेरे लिए प्रधान हो उठी | उस समय आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी हिन्दी-भवनके अध्यक्ष थे। उन्होंने इसी ओर अग्रमसर होनेकी मुझे प्रेरणा दी | उनकी प्रेरणा ओर प्रोत्साहनसे मैं इसके अध्ययनमे लगा रहा और गत पॉच-छः वर्षोत्क इस पुस्तककी सामग्री जुयाता रहा । पुस्तक जेसी भी बन पड़ी है, आपके सामने है । इससे अधिक मुझे नहीं कहना है | अन्तमें अपने उन मित्रों और शुमेच्छचुओंकों धन्यवाद दिये बिना नहीं रह सकता जिन्होंने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूपसे मुझे प्रोत्साहित किया है। आचार्य हजारीप्रसादजी द्विवेदीने पुस्तककी भूमिका लिखिकर मेरे प्रति अपने सहज स्नेहका परिचय दिया है। उनके आश्ीवांदसे ही यह पुस्तक लिखी जा सकी | मेरे सहयोगी भाई हरिशंकरजी शर्माने नाना भावसे




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