सरल जैन रामायणा - भाग 1 | Saral Jain Ramayan - (vol - I)

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Saral Jain Ramayan - (vol - I) by कस्तूरचंद नायक - Kasoorchand Nayak

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( १४ ) उक्तियों, सातिशय अलंकारों;नीतियों के कारण, तुलसी-रामाथरणं _ को ख्याति प्राप्त है, वह सब उन्हे स्वयंभू कविकी जेन-रामायण से प्राप्त हुईं है। यदि स्वयंभू रामायण प्रकाशित हो जाय तो पाठक यदह सहज दी जान सकेंगे कि तुलसी-रामायणमे জী कुछ उत्तमत्ता है. उसका अधिकाश श्रेय स्वयभू कविको है। यदि तुलसीदास जी अपने काव्यके कथानक के लिये भी इस ग्रन्थका आधार रखते तो उनका काव्य निर्दोष व सर्वश्न होता ' _ पद्मचरितके आधारपर रामचरित हिन्दी भाषामें आज पाया जाता है । जेन समाजमे पदूम-पुराणएका बहुत वड़ा आदर दै । बह प्रकाशित हो चुका है अतः आबाल दृद्ध वनिता उसका स्वाध्यांयकर श्रीरामके व सीताके पवित्र जीवनस शक्ता प्राप्त करते हैं। फिर भी एक कमी थी और वह यह कि हिन्दी भापामे कविता-मय कोई रामचरित जैन रामायणके आधार पर नहीं था जिसे लोग सुन्द्रताके साथ गायन बादनके साथ पट न-पाठन कर मनोरंजन करते और सुन्दर आदर्श चरित्रको तथा उनकी नीतियों को हृ्यद्भम करते। जिस प्रकार तुलसी-रासायण का घर-घरमे पाठ होता है वेसा जेन गृहस्ंको कान्यमय रामायणुके अभावसे तद्र प स्वाध्याय. करनेकी सुनिधा श्राप्त नहीं थी। यह एक कमी थी जो लोगोंको समय समय पर खठकती थी पर जैन कवियों का इस ओर ध्यान नहीं था । प्राचीन सम्यके जेन कवियोनि अनेक भरन्थेके अनुवाद कर भाषाकाव्योंका निर्माण किया है 1 हजारो पय-स्तुतिया-पृजाये-जीवन कथाएं कान्यके रूपमे निर्मितकर अपनी कवित्व शक्तिको सफल किया है | यद्यपि वर्तमान समय में भी अनेक जेन कवि है तथापि उनका ध्यान




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