स्वाभिमान | Swabhiman

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Swabhiman by मदनलाल कटारिया - Madanlal Kataria

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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स्वाभिमान 17 सकते क्योकि उनका सारे घर पर दबाव था। इसलिये मन मार कर रह जाते और उनको सहलाते रहते। लेकिन मोहिनी कहती-आप हमारी चिन्ता न करे। वो तो हमारे पूज्य हैं। उनकी सेवा करना हमारा धर्म हे | यह सुनकर दोनो गद्गद हो जाते ओर अन्तर्मन से आशीर्वाद देते कि तुम्हारा भविष्य उज्ज्वल हो। (4) गरमी का मौसम था। एक दिन सब भोजन आदि से निवृत्त हो चुके थे। सेठानी लक्ष्मी बीच चौक मे अपनी खाट पर बैठी थी और हवा के झोको से थोड़ा शान्ति का अनुभव कर रही थी। इधर तीनो बडी बहुएँ भी एक-एक करके अपने कमरो से नीचे अपनी सास के पास आकर सेवा का अभिनय करती हुई पाव दबाने बैठी और अपनी वाक्पटुता से मीठी-मीठी वाणी द्वारा सासूजी को खुश करने लगी। इधर मोहिनी भी घर का शेष कार्य निवृत्त करके आज अपनी जेठानियो को सासूजी के पास बैठी देखकर पास आ गई और बैठ गई नित्य क्रमानुसार उनके पाव दबाने | आज चारो बहुओ का एक साथ अपने पास मे बैठी देखकर हर्षित होती हुई सेठानी लक्ष्मी बोल पडी-मेरी प्यारी बहुओ ! आज तुम चारो को देखकर बडी खुशी हो रही है। पर एक बात मेरे मन को बार-बार




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