जिनेन्द्र भक्ति गंगा | Jinendra Bhakti Ganga

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भजन पृष्ठ भवन पुच्छ ग्यान बिना दुःख पाया रे भाई १३४ ज्ञान हूँ मैं, ज्ञान हूँ मैं ज्ञान १९९ ज्ञान बिन थन न पावोगे १३५ ज्ञान | अरू ৬ में २०६ ज्ञान दुर्लभ है दुनिया में १४१ ज्ञानी गुरू का है कहना २२० ज्ञानी जीवन के भय होय न १४२ ज्ञाता-दृष्टा आत्मा २८१ ज्ञानी थारी रीति रँ अचभो मौने आवे १४२ ज्ञान चक्र का स्वागत करते २८२ ज्ञानी जीव निवार भरमतम १४२ ज्ञानी ऐसी होली मचाई २८६ ज्ञान को क्या पटके पर माहि १७८ ज्ञाता दृष्टा राही हँ २०९ र्म श्री वीतरागायनमः ইনি ^ हे भगवन्‌ जो तेरापंथ वो मेरा पथ, हे भगवन्‌ ! वो मेरा पंथ जो तेरापथ पंथ वही .... . . .. .. - पंथ वही सर्वज्ञ जहां प्रभु, जीव - अजीव का भेद बतावें। पय वही निर्ग्रन्थ महामुनि, देखत रुप महा सुख पावें।। पंथ वही जहां ग्रन्थ विरोध ना, आदि - अनंतलों एक बतावें। पंथ वही जहां जीवदया वृष, कर्म नशाय के सिद्ध बनावें।। पंथ वही जहा साधुचले सब, चेतन की चरचा चित लावें। पंथ वही जहां आप विराजत, लोक - अलोक के ईश हो जावे |! पंथ वही परमान चिदासंद, जाके चले भव भूल ना आवे। पथ वही जहां मोक्ष को मारग, सीधे चले शिव लोक में जावें।। जारि -जिन्शाकनम्‌




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