प्रवचनसार एक अध्ययन | Pravachansaar Ek Adhyyan

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Pravachansaar Ek Adhyyan by लक्ष्मीचंद्र जैन - Lakshmichandra Jain

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रवचतसार: एक अध्ययन -- ५ लीन अभिलेख नहीं हैं। इसके सिवाय कुन्दकुन्द के युग से उनका लेखन समय की बड़ी दूरी पर हुआ दै जिससे, वे स्वयं ही अधिक साख के योग्य नहीं हैं। प्रोफेसर चक्रवर्ती (31]ने पुण्याञ्रबकया(32)के प्रमाण के आधार पर कुन्दकुन्द के जीवन का वर्णन किया है। इसमें उन्होंने कहा कि उसे शास्त्रदान के उदाहरण के रूप में उद्धुत किया गया है। संक्षेप में कथा इस प्रकार है: भरत-खण्ड के दक्षिण-देश में, पिदयनाडू जिले में कुमरई नगर मेँ करमुण्ड' नामके एक धनवान्‌ वणिक अपनी पलि श्रीमती सहित रहता था! उनके पास एक ग्वाला था जिसका नाम मयिवरन्‌ था, जो पशुओं का पालन करता था। एक बार उस बालक ने बड़े आश्चर्य के साथ देखा कि जहाँ संपूर्ण जंगल दावानल से जल चुका था, वहाँ बीचों बीच कुछ वृक्ष हरियाली सहित पल्लवित थे। उस बालक ने उक्त स्थान को देखा भाला ओर पाया कि वहाँ आगम ग्रंथों सहित कोई पेटी है तथा किसी मनि का निवास है। इससे उस श्रद्धालु बालक ने समझा कि उन्हीं के कारण यह स्थान आग से जलने से बच गया है। उसने उन ग्रंथों को घर लाकर पवित्र स्थान पर विराजमान कर उनका प्रतिदिन पूजन प्रारम्भ कर दिया। एक बार कोई धर्म-गुरु उस घर में आये; व्यापारी ने उन्हें आहार दिया, और इस बालक ने उन्हें वे ग्रंथ भेंट किये। इस धर्म कार्य के लिये साधु ने स्वामी तथा बालक को आशीर्वाद दिया। स्वामी के कोई संतान नहीं थी। और कालान्त में स्वामीभक्त बालक मरकर स्वामी के यहाँ पुत्र रूप में जन्मा | जैसे जैसे समय बीता, यह कुशाग्रबुद्धि बालक कुन्दकुन्द नाम का एक महान्‌ दार्शनिक एवं धार्मिक गुर हुआ । इसके पश्चात्‌ , प्रोफेसर चक्रवर्ती सामान्य से अन्य घटनाओं का निर्देश करते है] यथा यह विवरण :- कि उत्कृष्ट बुद्धिमान के रूप में कुन्दकुन्द, श्रीमन्धरस्वामी के समवेशरण मे, दौ चारण ऋद्धिधारी भुनियों दारा उक्त भ्रमण का सत्यापन, कुन्दकुन्द की उनके प्रति उदासीनता, जुगुप्सा सहित उनकी अनुवर्ती वापिसी, भ्रमनिवारण एवं अन्त में पूर्वविदेह क्षेत्र में श्रीमन्धरस्वामी के समवसरण मे कुन्दकुन्द का पहुँचना। शास्त्रदान के पुण्य ने उन्हें साधुसंघों का संगठक एवं महान्‌ संघ नायक बना दिया इसके बाद उन्हें आचार्यपद प्राप्त हुआ और उनका जीवन कल्याणकारी एवं कीर्तिवान्‌ व्यतीत हुआ। (33) कुन्दकुन्द के विषय में एक अन्य परम्परागत कथा-- पंडित प्रेमीजी (34) ने कुन्दकुन्द की एक अन्य कथा का उल्लेख ज्ञानप्रबोध नामक ग्रंथ के प्रमाणाधार पर दिया हैः-मालवा के बारापुर नगर में एके राजा कुमुदचन्द्र अपनी रानी कुःमुदचन्दिका के साथ रहते थे। उसके राज्य मेँ कुल्दरेष्ठि नामक व्यापारी अपनी पलि कुन्दलता सहित रहता था, जिसके कुन्दकुन्द नामक एक पुत्र था। किसी समय उस बालक को अपने मित्रों के साथ खेलते समय, किसी उद्यान में एक मुनि अनेक गृहस्थो के साथ दिखाई दिये। बालक ने सावधानीपूर्वक उनके उपदेश सुने। मुनि के वचनों और चरित्र से बालक पर इतना प्रभाव पड़ा कि मात्र ग्यारह वर्ष के इस बालक को वैराग्य हो गया और वह उन जिनचंद्र मुनि का शिष्य हो गया, और उनके साथ रहने लगा। माता पिता को इस घटना से बहुत दुःख हुआ। कुछ ही अवधि में कुन्दकुन्द को जिनचंद्र के शिष्यों के मध्य इतनी अग्रगण्यता प्राप्त हुई कि बे तैतीस व॑र्ष की उम्र में आचार्य बन गये। वै अंतमुखी एवं धर्भध्यान में विशेष समुन्नत्त हुये । एक बार उन जैनधर्म के कुं




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