स्त्रियों की स्थिति | Striyon Ki Sithiti

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Book Image : स्त्रियों की स्थिति - Striyon Ki Sithiti
[adinserter block="2"]

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about श्रीमती चन्द्रावती - Shrimati Chandrawati

Add Infomation AboutShrimati Chandrawati

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
भारत में ख्री-जाति का भूत, वर्तमान तथा भविष्यत्‌ ७डायु का विवाह भी बाल-विवाह समझा जाता है । इसलिये वेद ने भायु की कोई सीमा नहीं बाँधी। परंतु एक नियम का विधान कर दिया है। यह नियम जिस समाज में ढागू होगा, उसमें बाल-विवाद्द की प्रथा नहीं रद सकती ।वैदिक काल में आत्मिक विकास की दरृुष्टि से भी ख्रियाँ पुरुषों के साथ एक ही क्षेत्र में विचरण करती थीं। ब्रददारण्यक में याज्ञवल्क्य तथा मैत्रेयी का संवाद आता है । पाज्ञवल्क्य अपनी संपत्ति तथा घर आदि छोड़कर स्वयं जंगछ में जाकर अध्यात्म- विद्या में अपना समय देना चाहते हैं, वह मैत्रेयी से अपना विचार कहते हैं । मैत्रेयी कहती है, यदि संसार का सारा घन एकत्रित करके उसको दे दिया जाय, तब भी वह घर रहने को तैयार न होगी । उसका यह विचार जानकर याज्ञवल्क्य मैत्रेयी को अपने साथ ले जाने से पूर्व आध्यात्मिक उपदेश देते हैं । इस ऊँचे उपदेशा को जिस सरढ्ता के साथ मैत्रेयी हृदयंगंम कर लेती है, उससे मैत्रेयी के मानसिक तथा आत्मिक विकास की ऊँची अवस्था पर पर्याप्त अ्रकारा. पढ़ता है । आध्यात्मिक ज्ञान रखने के साथ-ही-साथ धार्मिक क्षेत्र में भी ख्री का पुरुष के बराबर ही स्थान था । कोई यज्ञ ख्री के भाग के विना पूरा न समझा जाता था। रामचंद्रजी के राज्याभिषेक पर, सीता के परित्याग के पश्चात्‌, जव राजसूय-यज्ञ होने छगा; तो सीताजी का होना अत्यावश्यक समझा गया । उस समय सीताजी की स्वर्ण-मूर्ति को उनके स्थान पर रखकर यज्ञ की पूर्ति की गई




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now