श्री राम शतकम | Shriramshatakam

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Shriramshatakam by पं मोतीराम त्रिपाठी - Pt. Motiram Tripathi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भाषाटीकासदित । श्३ #७ ३ अल ७ अयथे- | जब रावण सीताजीको लियेजाताथा तो उस समय जटायुने रावणके साथ घोर संग्राम किया यूद्धमं रावणके मारे हुए जटायुकों शीघ्र जिन्होंने उत्तपपददिया और क्ेध को मुक्ति ेनिवाढे उन रामजीकों इम शिरसे प्रणाम करते हैं ॥ ४० ॥ शवरिका बदरीफंठ भक्षकं जनमनोगत भात्र विदेंसदा ॥ सममिपावनदशिमतीव हि रघुबरंशिर . सा प्रणमाम्यहम ॥ ४१ ॥ अथ--शवरीके चख़ेहुए बरीके फलोंको प्रीति पूर्वक खाने धाउे और भक्तजनाके मनके अभिपाय को जाननेवाल आर भ्राति एवित्र करने वाली जिनकी दृष्टि हे एसे उन रामजीकों हम शिरस प्रणाम करते इं ॥ ४१ ॥ इसके अनन्तर पम्पासरांवर के तीर पर आये सुग्राव के भेजे | पवनजामलमांसल सन्दरां स्पारराजित पत _ तराज्ूक् ॥ अनुजमाफत्क्क युक्तमसहमभजरघुबरामल नीलमहामाणिमू ॥ ४२ ॥। थे--श्री इनूमानजी के पवित्र और पुष्ठ सुन्दर कन्पे पर जिनका अति पतरित्र धर्रार शोमित होरदादै और भाई लक्षमण रूपी मोतीसे युक्त ऐसे रामचन्द्र रूपी मदद नील मणिकों दम मजत हद ।॥ ४२१ ॥ रुचरकण्ठसराज्य बधावयांगजावपद्धर चाप रलासखस ॥ कापसखखलदप एवनाशक रघवबर शिरसा प्रणमास्यहम ॥ ४३ ॥ .. अथे--सु्रावके राज्य और खीके वियोगसे उत्पन विपत्ति फद्ूर करने वाछे जिनकां धनुष बाणई आर. सुर्ावकोमित्र व।- ।छसदूशच जांकाहे अविशेको उसके दपेकों दलन करने वाले एस श्रारामजाका शिरस प्रणाम ॥ ४




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