श्रीरामशतकम् | Shriramshatakam

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Shriramshatakam by पं मोतीराम त्रिपाठी - Pt. Motiram Tripathi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भाषाटीकासहित | १३ अ्थ--[ जब रावण सीताजीको लियेजाताथा तो उस समय जटायने रावणके साथ घोर संग्राम किया | युद्धमं रावणके मारे हए जयायुको शीर जिन्होनि उत्तमपददिया ओर कवेधरो युक्ति नेवारे उन रामजीको हम शिरसे प्रणाम करते दं ॥ ४० ॥ शवरिका बदरीफंरु भक्चकं जनमनोगत भाव विदसदा ॥ समभिपावनदष्िमतीव हि रधुबरशिर सा प्रणमास्यहुम्‌ ॥ ४१ ॥ अथे--शवरीके चखेहए बरीके फलोंको प्रीति पैक खाने परे और भक्तजनोंके मनके अभिप्राय को जाननेषाज्े ओर भ्राति पवित्र करने वाली जिनको दृष्टि हे एसे उन रामजीकां हम शिरस प्रणाम करते ६ै॥ ४१ ॥ ( इसके अनन्तर परम्पासरावर / के तीर पर आय सुग्राव के भरे ) | पवच्जामलमासल सन्दरा सपारराजत पत चराह्षकम ॥ अनु जमाक्तक युक्तमह भज रघुबरासल नालमहामाणेम्‌ ॥ ४२ ॥ अथं--श्री हनृपानजी के पवित्र ओर पष्ठ खुन्दर कन्थे पर्‌ जिनका आति पवित्र शर्रार शोभित होरहाहे ओर भाई लक्तमण रूपी मोतीसे युक्त ऐसे रामचन्द्र रूपी महा नीकू मणिको হম मरजत हैं || 7२ ॥ राचरकपफप्टसराज्य बधावयागजावपद्धर चाप सलासुखस ॥ कापसखखलदप विनाशक रघवर शिस्सा प्रणमाम्यहुम ॥ ४३ ॥ अथ--सुरग्रीवके राज्य भोर स्वीके वियागसे उत्पन्न विपत्ति फ दर करने वाले जिनका धनुष बाणह आर सुग्रावकामेत्र (व।- लिसदृश / जाकाईे आवेबकां उसके देपेको दलन करने वाल (स श्ररामजाका शिरस प्रणामहई ॥ ४३ ॥




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