आधुनिक महाकाव्य | Aadhunik Mahakavya

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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ल आधुनिक सहाकवि #सहाकाव्य का आभास-स्वरूप यह अन्थ सतन्रह सर्मो में केवल इस उद्देश्य से लिखा गया है कि इसको देखकर हिन्दी साहित्य के लब्धप्रतिष्ठ सुकवियों और सुलेखकों का ध्यान इस त्रुटि के निवारण करने की ओर अग्रसर हो, आकर्षित हो |? इस प्रकार उपाध्याय जी के अपने ही शब्दों में 'प्रियप्रवास! एक मद्ाकाव्य नहीं प्रच्युत 'महाकाब्याभास' ही है। इतना सव-कुछ होने पर भी हम एक बात तो अवश्य कहेंगे ही कि महाकाब्य होने या न होने से “प्रियप्रवास! के महत्त्व में कोई विशेष तर नहीं आता । इसका प्रत्येक सर्य रस का सागर है। उसमें आरम्भ से अन्त तक रस का अविच्छिन्न प्रवाह स्वतः बहता रहता हैं । पाठक पढ़ते-पढ़ते आ्रात्मविभोर-सा हो जाता है । वह प्रवन्ध-काव्य-सम्बन्धी उक्त समालोचनात्मक मंझूट में अपने-आपको न डालकर रसास्वादन ही में तस्पर रहता ह । पवनदृत की मौलिक एवं स्ण्हणीय सरस कल्पना ने तो इसके सोदर्यं मे चार चध्िहीलगादिये ই। अतः कहना होगा कि 'प्रियश्रवास! का हिन्दी के प्रवन्ध-काब्यों में अपना एक विशेष स्थान है और चह सहृदय पाठकों को सदा अपनी ओर थआक्ृष्ट करता रहेगा, इसमें कुछ सन्देह नहीं | (प्रियप्रवासः के प्रकृति-चित्रण-- 'प्रियप्रवरासः के चरित्रचित्रण, प्रकृति-व्णंन, भाषा व सैली सव में एक अपनी ब्रिचित्र मोलिकता है। 'प्रियप्रवास” से पूर्व खड़ीबोली में कोई महाकाब्य नहीं था, फलतः उपाध्याय जी को सब-कुछ अपनी ही ओर से लिखना पड़ा। उन्होंने अपने मार्ग का निर्माण श्रपनी प्रतिभा करे बल पर श्रिया} उन पर संस्करत-कवियों ॐ सिचा श्रन्य




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