सूर की भाषा | Suur Ki Bhasha

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Suur Ki Bhasha by डॉ दीनदयालु गुप्त

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१, वजमाषा और सूर की माषा के अध्ययन का इतिहास विषय प्रवेश-- प्रामाणिक पाठ के अभाव मे प्राचीन कवियों की कृतियो के विधिवत्‌ अध्ययन्त मे कठिनाई पडती है । स्थूल रूप से यह्‌ अभाव उन सभी वातो की जानकारी मे वाधक सिद्ध होता है जिनका सवध अत साश्यसे है! पाठकी अप्रामाणिकताकेदो रूप होते है । एक, पाठ का अशुद्ध रूप भर दूसरा, प्रक्षिप्त अग | জনি दृष्टिकोण,उदेश्य, भादरं, पाडित्य आदि से अवगत विज्ञ आलोचक को किसी श्रय के प्रक्षिप्त अथवा अप्रामाणिक भागो का पता लगाने मे अधिक किनाई नही होती । अतएव सदेहात्मक अंशो को निकाल देने के वाद शेप भाग मे केवल पाठ की अशुद्धता का दोष रह जाता है, जिसके बने रहने पर भी भाषा-अध्ययन-कार्य किसी सीमा तक किया जा सकता है। भाषा के अध्ययन के प्रमुख पक्ष, उसका इतिहास, तत्कालीन स्थिति का प्रभाव, शब्द- भाडार, साहित्यिक और आलकारिक विशेषता, वाक्य-विन्यास, व्याकरण के नियमौ का निर्वाह आदि है । इनमे से प्रथम पांच विपयो का अध्येता, प्रामाणिक पाठके अभावमे भी, किसी न किसी प्रकार अपना काम चला लेता है, परन्तु अतिम अर्थात्‌ व्याकरण-विषयक अध्ययन के कुछ पक्षो के सूक्ष्म अध्ययन मे, वसी स्थिति मे, कुद वाधा अवभ्य पडती है । आज से लगभग यदह वपं पूवं तक, सर-काव्य का सवंमान्य प्रामाणिक पाठ सुलभ ने होने के कारण उनकी भाषा का अध्ययन उचित रीति से नही हो सका। फिर भी, हिदी के विद्वानो ने इस दिशा मे जो कायं किया, उसका मूल्याकन करने के पूवं उक्त कठिनाई को ध्यान मे रखना आवश्यक ह । सूर-साहित्य के आलोचको ने उनकी काव्य-कला के विभिन्न अगो पर प्रकाश डालते समय भाषा के सवधमे, प्रसगवश ही विचार किया है । स्वतत्र रूप से अर विस्तार के साथ सूरदास की भाषा के विषय मे किसी भी विद्वान ने अपने विचार प्रकट नही किये ह । त्रजभाषा गौर उसके व्याकरण की विवेचना एव सूरदास और उनके काव्य की आलोचना के रूप मे जो सामग्री आज तक प्रकाश मे आयी है, स्थूल रूप से उसे तीन वर्गों मे विभाजित किया जा सकता है -- के हिंदी भाषा के इतिहास और ब्रजभाषा के व्याकरण । खं. सूर-काव्य के भूमिका-सहित स्फूट सकलन ।




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