स्वयम्भू - स्तोत्र | Swayambhu Stotra

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Swayambhu Stotra by आचार्य समन्तभद्र - Acharya Samantbhadra

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१६ ममन्तभद्र-मारता ज कभ. ७७७, ०३३७ ৬১৪ ১ ১০৬ क ७८७९, ৬৬৩ (क [द ৬১১৬ ০:৬৫ ৭ $ 65৫ সার ৪৫ १९4) जक 999 659) चयक । 9.0 9.59) जो 66 99 जाः 9.56 9 द) कि 936 969 ) ज । 969 9.69 › आ ৯৮$ (৫ ১৫ 8৫$ 8৫% এ ॥ ०५ भ च বি | उत्पत्ति अथवा ज्ञप्ति--नहीं बनती। ( केसे नहीं बनती, यह बात % 'सुयुक्तिनीत-तत््व” को स्पष्ट करते हुए अगली कारिकाओंमें वतलाई गई है)।' 4 अनेकमेकं च तदेव तत्वं < | भेदाऽन्वयज्ञानमिदं हि मत्यम्‌ । † म्रषोपचारोऽन्यतरस्य लोपे ५ तच्छषलोपोऽपि ततोऽनुपाख्यम्‌ ॥२२॥ £ वह सुयुक्तिनीत बस्तुतत्त्व भेदाउभेद-ज्ञानका विषय है ओर अनेक तथा एकरूप है--भेदज्ञानकी-पर्यायकी-दृष्टिस अ्नेकरूप हैं च +र के, क 9, ক ক ३ ९€ मा 8, (1) ক क कै ॥ क । 9 ` ज, 939 9.56 ` वव 9.58 क.) 9 রা ৪৪৫ ৯৫৫ ‡ तो बरही अभेदशानकी-द्रव्यकी-दश्सि एकरूप हे--ओर यह वस्तुको ‰ । भेद-अभेदरूपसे अहण करनेवाला ज्ञान ही सत्य है--प्रमाण है। ४ जो लोग इनमेंसे एकको ही सत्य मानकर दूसरेमें उपचारका | | व्यवहार करते हैं वह मिथ्या हैः क्योंकि ( दोनोंका परम्पर अबिना- ६: क, স্পা ৯৫৩ क माव-सम्बन्ध हेनेमे ) दोनोँमसे एकका अभाव माननेपर दृसरेका भी अभाव हा जाता है। दोनोंका अभाव हा जानेसे बस्तुतत्व अनुपाख्य-निःम्बभाव हो जाता है--श्रोर तब वह न तो एकरूप रहता है और न अनकरूप । स्वभावका श्रभाव होनस उसे किसी रूपमें कद नहीं सकते, ओर इससे सम्पूर्ण व्यवहारका ही लोप ठहसता है ।' सतः कथश्वित्तदसल-शक्तिः खे नास्ति पुष्पं तरुषु प्रमिद्धम्‌ । ¢ ৬ सवे-स्वमाव-्युतपग्रमाशं स्व-वाग्विरुद्रं तव दष्टितोऽन्यत्‌ ॥ २३ ॥ जो सत है-स्वद्रव्य-तेत्र-काल-भावसे विद्यमान है- उसके पज ९ ३९३ ॥ ९९ + काका र 999 व 99 98) ८96 9 स 96 9967 य 996 99 व 9३.9३ अक 99 9999० 9१७ ११७ भअ 996 999 ५95 সী 9 छी क, क, ४ जकन 9.56 096) कक 99 9१० अक ६ ४१९० ०१ ৬৫ कः ৪৬ ৯ क क ॐ) क) कः क ওক, कब এআর ৪৫4 शके 95१०३ ০০ চক ৬৫৫ (वाय ऋ, जया, 989 का क, क. ক 9५9 সারার ५ ৪৬৭ के के श (१ দু খাটি খু क. ক সত আজ ক. ह, সা ৯৩৫০ ৮ ক ৫৯৫৫ ৮ छ, ৬




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