भाव - विलास | Bhaw - bilas
श्रेणी : साहित्य / Literature

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
8 MB
कुल पष्ठ :
180
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)२-विभावदोहाजे बिशेष करि रसनि को, उपजावत हैं भाव)
भरतादिक सतकवि सवै, तिनको कहत बिभाव ॥
ते विभाव द्वे मांति ॐ, कोषिद् कहत बखानि |
आलम्बन कहि देव अर्, उदीपन उर आनि ॥शुब्दाथ---रसनिको-रसो का | उपजावत-उत्पन्न करते हैं |भावाथें--जो भाव रसो को उत्पन्न करते हैं उन्हें भरतादिकआचाय विभाव कहते हैं | विभावों को कवियों ने दो तरह का कहा है !
एक आलमग्बन और दूसरा उद्दीपन ।(क) आलम्बन
दोहारस पले श्रालम्बि जिह, सा आलम्बन होइ ।
रसहि जगावै दीप ज्यो, उहीपन कटि सेई ॥शब्दाथ---उपजै-उत्पन्न हो | आलग्बि-आश्रय पाकर ।¢ ^~ না
भावाथे---जितका आश्रय पाकर रसों की उत्पत्ति होती है, उसे
आलस्बन और जो रसों को उद्दीक्त करने हैं वे उद्दीपन कहलाते हैं।
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