मालविकाग्रिमित्र नाटक | Malvikagrimitra Natak

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Malvikagrimitra Natak by पं. विजयानन्द त्रिपाठी - Pt. Vijayanand Tripathi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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ক এ क ह हर. चै, ক ক नव रापित आते হাখিলসুল पोध की नाई । चट उखाइते उसे देर लगती क्या साई ॥ ८ || राज़ा-लों फिर अर्थशासत्रकारों का चचन अवषय सत्य होगा उसकी इसी छिठाई का बहाना रूगाकर चट सेनोपति को थाज्ञा दे दो | मन्त्री-बहुत अच्छा | ( गया ) ( परिजन काम घिरे राजा के अग्ल बगल में छड़े रहे ) विदूपकर-[ आकर ) मित्र महाराज ने आज्ञा दी है कि- गौतम कोई उपाय लगाओं, जिससे अकस्मात्‌ सित्र मे देखी हुई मालविका का प्रत्यक्ष दशन हों। मेंने भी वेसा प्रबन्ध कर दिया, अब चअकूकर उनकी इसकी खबर दूं 1( कुछ बढ़ता है ) राजा-( विदृषक्ञ को आते देखकर ) ये दुसरे मेरे और कार्य्यों के मनन्‍्त्री आ पहचे * चिदू-( पास आकर ) आपको बढ़ती हो । गाजा- शिरर हिलाते हुए ) इधर वैरो । विदू-ज्ञों आज्ञा | ( बेठजाता है ) राजा-क्या उसके लिये कोई उपाय दूँढ निकालने में तुमारी बुद्धि ने कुछ काम किया ? बिदू-अजी , उपाय की फलूसिद्धि पूछिये ! राजा-सो कैसे ? विदु-६ कानमें ) ऐसे ( कहता हैं ) राज़ा-बाह मित्र : तुमने ठोक उपाय लरूमाया। यद्यपि फल सिद्धि में बड़ी अडचन है तथापि तुम्हारे इस उद्योग से अब मझे आाशा बंधती है-क्यों कि-- । £ कारन सथातिवन्ध साथ सकता दै सोई । अ, = भ, ए = च, क चः, ৬ ভি जिसे सहायक पूण योग्य होता है कोई ||




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