प्रसाद का जीवन और साहित्य | Prasad Ka Jivan Aur Sahitya

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Book Image : प्रसाद का जीवन और साहित्य  - Prasad Ka Jivan Aur Sahitya

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रसाद श्रे जनमेजय का नाग-यज्ञ (१६२६), कामना (१६२७), स्कंदगुप्त विक्रमादित्य (१६२६), एक घूँट (१६२६), चैंद्रगुप् मोर्य १६३१), भ.वस्वामिनी (१६३३) घ--कहानी--छाया (१६१२), चित्रधा की कहानियाँ (१६१८), प्रतिष्बनि (१६२६), आकाश-दीप (१६२६), आ्रँधी (१६३९१), इदठरजाल (१६३६) डछः--उपन्यास--कंकाल (१६२६), तितली (१६३४), दरावती ( अपूर्ण ) --निबंध--काव्य श्रोर कला (१६३०--१६३६) छ--इंद” (१६०६-१६, १६१६), जागरण (१६२८) शरीर हंस (१६२८) के संपादकीय इन विविध श्रोर विस्तृत रचनाओं से हमें प्रसाद के ग्राभ्यंतरिक जीवन ओर उसके क्रम-विकास के संबंध में काफ़ी मिल जाता है। कविता ओर कहानी प्रमुख रूप से उनके व्यक्तित्व के श्रन॒भूति प्रधान अंग को हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं, उपन्यास नाटक और निबंध--लेख उनके वस्तु जगत्‌ , साहित्य ओर कलाससंबंधी गूढ़॒ ज्ञान श्रौर अगाध चिता कै सावी १ । “कंकाल! में उन्होंने जिस सामाजिक इृहत्‌ चित्रपटी का श्रयोग किया है उसमें मठों, मंदिरों, नगरों, प्रामों थ्रौर परित्यक्त प्राणियों का जोवन शस प्रकार शष जाता है कि रचना सम्पूर्ण भारत समाज की प्रतीक बन जाती है । “तितली? में ग्रामीण जीवन श्रोर तत्संबंधी छुघारवाद से उनका निकट का परिचय ज्ञान पड़ता है। ऐतिहासिक नाटकों, कहानियों श्रीर नाटकों की भूमिकाओं में प्रसाद इतिहास के खोजक के रूप में हमारे सामने श्राते हैं। उनके ख्वतन्त्र निबन्ध स्कति, साहित्य श्रौर कला के रेत मेँ गंभीरतम चिता श्रोर गबेषणा उपस्थित करते हैं। संपादकीय लेखकों से उनकी साहित्य छोर कला संब्धी क्रांतिकारिता रपट होती है। इस प्रकार हम प्रसाद के इस सारे विविध थौर विस्तृत साहित्य को उनके भीतर-बाहर के जीवन से संबद्ध. कर सकते हैं। जैसा हम ऊपर लिख चुके हैं 'प्रसाद” के जीवन में घटना-क्रम श्रधिक नहीं मिलता | ११ वर्ष की श्रवस्था तक वह बड़े दुलार से पलते रहे । वह इस धनी, समृद्ध शरीर संस्कृत परिवार के खिलौने थे | ११ वर्ष की अवस्था तक बह नाक में बुलाक पहने रहते थे | सबसे छोटे होने श्रोर एक्म्रात्र-पुत्र संतान होने के कारण उन पर माता-पिता का सबसे अधिक स्नेह था | इसी श्रवर्था में घुड़न हुश्रा | जवलपुर्‌ पास नर्म॑दा-तट पर ज्ञारखंड-नामक स्यान है। श्रपनी माता श्रोर तीन बहनों के साथ प्रसाद मु'डन के लिये वहीं गए | व्यासजी इस प्रसंग के संबंध में लिखते हैं-- श्रमर- कण्टक पर्वतमाला के दृश्यों का उनके जीवन पर घड़ा प्रमाव पड़ा घा | उस समय एक




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