गाँधी युग के जलते चिराग | Gandhi Yug Ke Jalate Chirag

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Gandhi Yug Ke Jalate Chirag by काका साहब कालेलकर - Kaka Sahab Kalelkar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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बापू के तीन चिर साथी मं कई थार बढ़ चुझा हैं कि तोन ऐसे ब्यक्ति थे नो बापू है जीवन में सनु-मन-प्राण से औवन्थोत हा गये थे और मरते दमतक उस से एक-रुग बने रहे । उन का आरम-गमप्रेण बिल्दुल अनुपम था। बस्तरबा, बापूजी की करोब-करीब अनपद सह-धर्मिणी, शुरू से आशिर्तक बापू के सारे प्रयत्नों, पुस्पायों व मानसिक सषपो कौ साक्षी, ओर उने के जीवन-दुद्धि को जद्दोंअहद में सहकारिणी रही। हम मब, जिस्होंने दस दम्प्ती को उन की जीवन-यात्रा की आखिरी मजिछ मे'देखा सो उन देः आपयो प्रेम व ऐक्य से सदा प्रभावित होते रहे, जो बरयों के आत्मंरय व वफादार मंत्रों का मीठा फल था । एक थार दोनों की सालो मे पित्र भीर उसनत दाम्पत्य-प्रेम को कसक देख पाने का सौभाग्य मुझे हाप्तिछ हुआ षा, और मैं क१झत्य हुआ । यह भाव सम्पूर्ण श्रेय भोर निष्ठा का सूचक था। फस्तूटवा के अपड़ आत्म-समपंणा उनके विशुद्ध स्वार्थत्याग और नम्स्‍या का गुप्त कारग यही जैध्यिक प्रेम या ~ २. बापू के दृशरे जीवन-रंगी व सहमाधक महादेवभाई देसाई ये १ गोयरा में बापू व महादेव भाई की प्रहदी मुलाकात, व उन के स्वीकार का मैं साक्षी था । “तारामेत्रक” का उत्तम ममुना इस प्रसंग में मुके मिल गया। मद्गादेव को देखते ही बापू নি দহন জিম“ ঝট वही है, जिसकी में राह देखता बैठा था 1? उन के सहकाय के झुछ के दिनों में भी मद्भादेव ने बापु के दिल ऐसा घर कर छिया कि एक बार तेज़ बुखार के सन्निपातमे , ^




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