सर्वहितकारी | Sarvahitakari

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यशपाल - Yashpal

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वेदव्रत शास्त्री- Vedvrat Shastri

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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| भारत सरकार द्वारा रजि० नं० २३२०७५७३ ৮৮৫ ইক /85-2/2090 दे ०श्रचूर ए ভক্তি है, ९६, ०८, ५३, 2৮ श्र / 01 ^ प 01) 1 % (4 1 1 19 ता লক বা ও পি २६ अक ६ २१ जनवरी, २००२ -सुखदेव शास्त्री, महोपदेशक, दयानन्दमठ, रोहतक (हरयाणा) ১৩ वेदोत्पत्ति कर्ता परमेश्वर ने मनुष्य जीवन को सर्वोत्तम उत्कृष्ट है बनाने के लिए अथर्ववेद के काण्ड १८, सूक्त ३, मन्त्र ३८ से लेकर ४४ तक | महत्त्वपूर्ण उपदेश देते हुए आदेश दिया है ॥ इमा मात्रां मिमीमहे यथापर न मासातै। &| एते च त्‌ मनुष्य को अपने जीवन की इस को अपने जीवन के ही. समस्त समय को इस प्रकार से उत्तमता से मापना चाहिए जैसे और किसी वस्तु को नहीं मापते। ऐसा जीवन बिताना चाहिए जैसे इन सौ वर्षो मे भी किसी ने भी नहीं जिया हो, नहीं बिताया हो, इन जीवन के १०० वर्णो मेँ तेरे जैसा ओर कोई भी न हुआ, सभी यह कटे कि- भूतो न भविष्यति |' मानवो के प्रति वेद के दसी अदेश को मानकर 'पचतन्त्र' के रचयिता प० विष्णु शर्मा ने लिखा ঘা- स जातो येन जातेन याति वशः समुन्नतिम्‌ । परिवर्तिनि संसारे मृतः को वा न जायते ।। अर्थात्‌ ससार में या राष्ट्र वंश मे वही आदमी पैदा हुआ माना जाता है, जिसने अपने वंश अथवा देश की सर्वतोमुस्ती उन्‍नति के लिए ही अपना जीवन समर्पित किया हो, वैसे तो संसार में मरकर जन्म तो लेते ही रहते हैं। एसे राष्ट्र के प्रति समर्पित करने वाले वीरो को उनकी जन्म जयन्ती पर इसलिए ही उन्हे स्मरण किया जाता है कि हम भी सभी राष्ट्वासी उनके जीवन से देशभक्ति की शिक्षा प्राप्त करे। ऐसे भारतीय वीरों मे नेता जी सुभाषचन्द्र बोस का नाम भी महान्‌ देशभक्त मे सबसे अग्रणी है । भारतीय क्रान्तिकारियो एवं स्वतन्त्रता सेनानियों मे वैसे तो अनेक वीरो के नाम भारतीय इतिहास के पृष्ठो मेँ स्वर्णक्षरों मे अंकित हैं। इनमे विशेषकर बगातियों के नाम भी प्रमुख रूप से उल्लिखित हैं, जिनमें योगी अरविन्द घोष, चितरंजनदास, रासबिहारी बोस, शचीन्द्रनाथ सान्याल, सुदीराम बोस, यतीन्द्रनाथ दास आदि-आदि विशेष हैँ । इनमे “नेता जी सुभाषचन्द्र बोस भी अपना संबसे महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थान रखते हैं। इसलिए भज २३ जनवरी को उनकी जन्मं जयन्ती पर हम अपनी हार्दिकं भावनापूर्ण श्रद्धांजलि देने के लिए उपस्थित हुए हैं। ऐसे महान्‌ देशभक्त नेता जी सुभाषचन्द्र का जन्म वीरभूमि बाल के कटके नगर में २३ जनवरी १८९७ को जानकीनाथ पिताश्री के घर में हुआ था। श्री जानकीनाथ जी बड़े शिक्षा विशेषज्ञ थे। नेता जी की माता जी भी बडी धर्माप्रेय, बुद्धिमती देवी थी। अपनी सन्तानो को सुशिक्षित बनाने मे उनका सहयोग सराहनीय था। इनके पिता जानकीनाथ ने अपना सुन्दर मकान कलकत्ता के एलगिन रोड पर बनवाया था, जहा नेता जी १९१३ तक इसी मकान मे रहते थे। नेता जी ने प्रथम १९०९ मे ही कटक के कोलिजिएट स्कूल में पढे थे। १९१३ तक एफए की तथा कुछ समय पश्चात्‌ कलकत्ता के स्काटिश कॉलेज से बीए की परीक्षा पास की। बीए की परीक्षा पास करने के पश्चात्‌ इनके पिता ने इन्हे आई सी एस 'की परीक्षा के लिए इग्लैण्ड भेज दिया। वहा जाकर सुभाष कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी मे प्रविष्ट हो गए। इग्लैण्ड मे पढते हुए इनका सम्पर्क “इण्डिया हाउस” मे भारत के महान्‌ देशभक्तो से हुआ। जिनमे “इण्डिया हाउस” के सस्थापक क्रान्तिकारियो के गुरु श्री श्यामजी कृष्ण वर्मा तथा वीर सावरकर तथा अन्य अनेक ब्रिटेन मे पढने के लिए आए हुए विद्यार्थिये से हुआ, जो आगे जाकर महान्‌ क्रान्तिकारियों की पक्ति मे शामिल हुए। भारतीय भवन (इण्डिया हाउस) में अनेक क्रान्तिकारियों के सम्पर्क मे आने के कारण स्वदेश भक्ति की भावनाएं मजबूत होती गई। अग्रेजो से घृणा बढती गई, उनकी घृणा का कारण उनके द्वारा अपने सहपाठी सस्कृत के विद्वान्‌ क्षत्रेशचन्द्र चट्टोपाध्याय को लिखे उनके पत्रो से पता लगता है। उन्होने कैम्ब्रिज से १२ फरवरी, १९२१ को जो पत्र लिखा था उसके अश इस प्रकार हैं- “साधारण अग्नेज युवक भारत के सम्बन्ध मे न अधिक जानता है, न जानना चाहता है। वह समझता है कि अग्रेज जाति महान्‌ जाति है। वह भारतीयों को सभ्य बनाने के लिए ही भारत गई है। वे भारत से मगवाकर फोटो दिखाते हैं कि भारत के लोग नगे रहते हैं। भारत सदा पराजित देश रहा है। आदि-आदि।” कैम्ब्रिज मे पढ़ते हुए यह सब कुछ देखा था सुभाष बोस ने। आई सी एस परीक्षा पास करने के बाद उनके माता-पिता को बडी प्रसन्नता हुई, बडी-बडी आशाए लगी। किन्तु नेता जी इस पराधीनता के आई सी एस के प्रमाणपत्रो को पाकर उसे पराधीनता का ही प्रमाणपत्र मानते थे। इसलिए उन्होने स्वदेश लौटने से पूर्व ही भारतमत्री के हाथो मे उस गुलामी की नौकरी के प्रमाणपत्र को फाडकर फेक दिया। स्वाभिमान के साथ भारत लौटे। भला, जिस आईसी एस के प्रमाणपत्र को पाने के लिए युवको को इग्लैण्ड जाना पडता था, उसे पास करके वापस आने पर शुरू में ही डिप्टी कमिएनर का पद मिल जाता था, उसे सुभाष ने ठोकर मार दी। भारत लौटने पर वे गाधी जी द्वारा सचालित “असहयोग आन्दोलन” मे शामिल हो गए। उस समय रौलट एक्ट, पजाब हत्याकाण्ड आदि का दमन चल रहा था। उन्होंने गाधी जी से भेट की। किन्तु गाधी जी के इस आन्दोलन से वे सन्तुष्ट नहीं हुए। नेता जी र्म विचारो के थे। इसलिए उनकी गाधी জী (शेष पृष्ठ सात पर)




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