महान् भारतीय | Mahan Bhartiya

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Mahan Bhartiya by ब्रह्मवती नारंग - Brahmvati Narang

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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महात्मा भोहनदास करमचन्द गाँची & मेंद्िक पास करके सांती जो काबून का ऋश्ययन करने बिलायन गए। ये झाटा के सामने पवित्र प्रमज्षाएँ काड़े गए कि घल दर देश में भी में सत्य ने छोड गा और आपकी झाजाओं क्रा पालन करूंगा | गवयुबक सोइन ने उस अनिज्ञाओं का शेबपूजक अत्चरशः पालन किया । প্রন उन्होने विज्यायन में महाविशान्य व विश्वविद्यालय में बिशेष सम्मान प्रध्त किया था, तो भी इन्हाने उन चुर करी धारम्‌ काने में विरोप उन्नति की, जिनसे सच्चे जीवन का নিলাযা होता হি) উইং পল লহ জীব १४ जून, १०३? को इंगलैंड से भारत में आने पर उन्हें ज्ञान हुआ कि चिरकाल पवन मातानी का वेहान्त हो चुका है और मेरे भाई में यद कात शुला 3 छिपा रखी है। फिर गांडी थी ते बकालत का कार्य आरम्ध किया, परन्तु उसमें उन्हें विशेष सफलता ने सिक्षी | १८६६ में गांधी जी की एक मुकरसे के सम्बन्ध में दशषिसी अफीरशा आना पष्ठ । कट अर उन्‍होंने ऋवाली भारतीयों पर होने बाले अनाचार्त का देखा वी उसका इड़य द्रवित हो उठा । জা हू भी मान! पकरार के अपमान सखदने पढ़े। उनके छदय से इस अपनातों का प्रतिकार करने की भावता प्रबत हो परी । অনার अपमानित भारतीयों का पगम कस्य दमक नेतृत्व अपय हाथ में ल्िया। रख्कित श्व हाल्ट्टाब के अनुभवा से गयी ऋअडिसासाक परतिशेद् ही मेरश {मजी बडा पहोच शान्तिपूपेक शस्यापह-आनदीलम आरस्थ कर दिया। कीनिक्म में सत्यामह-आश्रर् खाल्ला व 'हशिव्रयन ओोगीःसेयनस! प्रत्रछा प्रकाशित की ।! मिदाल आरनीय कये ॐ स्थापक दद्‌ । यहीं पर साधौ जीद उन दुय को प्राप्त किया, जिनके ड्रारा जीवन में उम्हीनि भारी सफलता प्रप्त खो दकि अदा दी सरकार फा भुकता पड़ा और বাদী জী छी प्रिजय हुई दष अक्रीदा के 1बदी হী জা কহ किर छन्‌ আছি झाकर उन्‍्हांति दशा की समग्र परित्थितियों का सूदम अध्ययन किया ।




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